महाराष्ट्र के विधान परिषद में उठाई गई चीनी फैक्ट्रियों को स्पेशल आर्थिक पैकेज देने, ऋण पुनर्गठन की मांग

मुंबई (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के विधान परिषद में चीनी फैक्ट्रियों को स्पेशल आर्थिक पैकेज देने, ऋण पुनर्गठन की मांग उठाई गई। कांग्रेस विधायक सतेज पाटिल ने शुक्रवार को विधान परिषद (लेजिस्लेटिव काउंसिल) में चीनी उद्योग की समस्याओं को उठाया। उन्होंने कहा, राज्य में चीनी उद्योग की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है, और इस इंडस्ट्री से हर साल 8,000 करोड़ रुपये का टैक्स दिया जाता है। हालांकि, अभी चीनी उद्योग बड़ी मुश्किलों की दौर से गुजर रहा है, और चीनी उद्योग को स्पेशल आर्थिक पैकेज देने, और साथ ही ऋण पुनर्गठन करने की मांग विधान परिषद उठाई गई।

विधायक पाटिल ने कहा, अब तक FRP छह बार बढ़ा है, लेकिन MSP एक बार भी नहीं बढ़ाया गया है। विधायक पाटिल ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि, एथेनॉल की कीमत कम है और राज्य का कोटा भी कम कर दिया गया है। इस पर सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटिल ने कहा की, केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के सामने एथेनॉल का मुद्दा उठाया है और इसका हल निकालने का भरोसा दिया है।

विधायक पाटिल ने कहा, राज्य में चीनी इंडस्ट्री ग्रामीण महाराष्ट्र के लिए लाइफलाइन है। चीनी उद्योग ने किसानों की आर्थिक हालत सुधारने का काम किया है।स रकार को शुगर इंडस्ट्री से 8,000 करोड़ रुपये का टैक्स मिलता है।शुगर इंडस्ट्री से 50 से 60 हजार करोड़ रुपये का टर्नओवर होता है; लेकिन, गन्ना उत्पादन और चीनी की पैदावार में कमी के कारण शुगर फैक्ट्रियों के सामने बड़ी फाइनेंशियल मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। चीनी का मार्केट प्राइस लागत के मुकाबले काफी नहीं है, जिसके कारण शुगर फैक्ट्रियों के लिए लिए गए शॉर्ट-टर्म लोन चुकाना नामुमकिन हो रहा है।

पाटिल ने कहा, केंद्र से चीनी का मिनिमम प्राइस 42 रुपये करने की मांग अभी भी पेंडिंग है, और एथेनॉल कीमत बढाने को लेकर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, शुगर कमिश्नरेट ने राज्य की 45 शुगर फैक्ट्रियों को बकाया FRP के बारे में नोटिस जारी किए हैं, जिसे चुकाने की शुगर इंडस्ट्री के पास ताकत नहीं है। विधायक पाटिल ने मांग की कि, किसानों और शुगर इंडस्ट्री दोनों के हितों की रक्षा के लिए तुरंत एक स्पेशल फाइनेंशियल पैकेज, लोन रीस्ट्रक्चरिंग और पॉलिसी फैसले लिए जाएं। इस पर कोऑपरेशन मिनिस्टर बाबासाहेब पाटिल ने कहा कि, मिनिमम सपोर्ट प्राइस का मामला केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और इस पर फॉलो-अप चल रहा है।

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