चंडीगढ़ : हरियाणा सरकार ने शुक्रवार को गन्ना क्षेत्र को लेकर चिंता जताई है और अनुमान लगाया है कि 2025-26 में गन्ने का उत्पादन 2020-21 की तुलना में 38% तक गिर सकता है। गिरती पैदावार, बढ़ती खेती लागत और घटते मुनाफे के कारण किसान लगातार गन्ने की खेती से दूर होते जा रहे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर के अनुसार, भाजपा विधायक घनश्याम दास के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का जवाब देते हुए सहकारिता मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने कहा कि, शुरुआत में गन्ने की खेती का रकबा 2020-21 में 2.46 लाख एकड़ से बढ़कर 2022-23 में 2.66 लाख एकड़ हो गया था। हालांकि, 2022-23 के बाद से गन्ने की खेती का रकबा लगातार घट रहा है।
मंत्री ने कहा कि, इस अवधि के दौरान औसत उपज में भी काफी गिरावट आई है और 2025-26 में यह 330 क्विंटल प्रति एकड़ रहने का अनुमान है, जो 2020-21 में दर्ज 348 क्विंटल प्रति एकड़ से लगभग 5.2% कम है। यह किसानों के लिए फसल की घटती उत्पादकता और कम आकर्षण को दर्शाता है। शर्मा ने सदन को बताया, 2020-21 की तुलना में गन्ने की खेती के क्षेत्र में लगभग 83,658 एकड़ की कमी आने का अनुमान है। उन्होंने आगे कहा कि, गन्ने की खेती के क्षेत्र में कमी के कारण चीनी मिलों में पेराई के लिए गन्ने की उपलब्धता कम हो गई है।
“2025-26 के दौरान गन्ने का कुल उत्पादन 536 लाख क्विंटल रहने का अनुमान है, जो 2020-21 के कुल उत्पादन 859 लाख क्विंटल से 37.55% (323 लाख क्विंटल) कम है। इसके परिणामस्वरूप, चीनी मिलों के कार्य दिवस घटकर 108 दिन रह जाने की संभावना है,” शर्मा ने आगे कहा। इससे पहले, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से इस मुद्दे को उठाते हुए भाजपा विधायक घनश्याम दास ने कहा कि, राज्य में प्रति एकड़ गन्ने की उपज में लगातार गिरावट के कारण किसान धीरे-धीरे गन्ने की खेती से दूर होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, परिणामस्वरूप, गन्ने के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल घट रहा है और चीनी मिलों को गन्ने की कम उपलब्धता का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि घटती उत्पादकता और गन्ने की कम उपलब्धता के कारण किसानों को लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।आम तौर पर, चीनी मिलें एक सीजन में 170 से 180 दिनों तक कुशलतापूर्वक काम करती हैं। हालांकि, मौजूदा सीजन में औसत केवल 105 दिन रहने की उम्मीद है, जो चीनी उद्योग के लिए एक चेतावनी है। गन्ना हरियाणा की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है। हाल के वर्षों में, गन्ने की खेती के क्षेत्र और इसकी औसत उपज दोनों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
सरकार ने बताया कि गन्ने के क्षेत्र में गिरावट का एक मुख्य कारण श्रम की बढ़ती लागत है, क्योंकि यह अत्यधिक श्रम प्रधान फसल है। श्रम की उपलब्धता में लगातार गिरावट आई है, जबकि मजदूरी में वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप, किसान अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। मंत्री ने कहा कि अन्य फसल प्रणालियों की तुलना में गन्ने में लागत अधिक और लाभप्रदता कम होती है। इसलिए, किसान मुख्य रूप से गेहूं-धान और आलू-मक्का-धान जैसी फसल चक्र प्रणालियों को अपना रहे हैं।
शर्मा ने कहा कि आधुनिक गन्ना तकनीकों के बारे में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रौद्योगिकी मिशन के तहत, उत्पादकता बढ़ाने के लिए गन्ने की चौड़ी पंक्ति में बुवाई करने वाले किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी 3000 रुपये प्रति एकड़ से बढ़ाकर अब 5000 रुपये प्रति एकड़ कर दी गई है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए एकल कली रोपण विधि अपनाने वाले किसानों को भी 3000 रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी दी जाती है। उन्होंने कहा कि रोगमुक्त बीज किसानों को 5000 रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी पर उपलब्ध कराया जाता है। मंत्री ने कहा, जलवायु परिवर्तन के कारण गन्ने की प्रमुख प्रारंभिक किस्मों पर तना छेदक, जड़ छेदक और मुरझाने जैसी बीमारियों का प्रकोप हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप औसत उपज और कुल उत्पादन में कमी आई है।”


















