पुणे:एग्रोवन की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र की निजी चीनी मिलों को करीब 500 करोड़ रुपये की सब्सिडी का अभी भी इंतजार है। वहीं राज्य सरकार उन मिलों को पेराई लाइसेंस देने से इनकार कर रही है, जो सरकार के बकाया शुल्क या देनदारियां समय पर नहीं चुकातीं। इस मुद्दे को लेकर अब विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का आरोप है कि, सब्सिडी वितरण के मामले में सरकार ने सहकारी और निजी चीनी मिलों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया है। बताया जा रहा है कि, राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें निजी मिलों के पक्ष में फैसला दिया गया था।
यह विवाद केंद्र सरकार की सॉफ्ट लोन–2015 योजना से जुड़ा है, जिसे गन्ना किसानों के बकाया एफआरपी भुगतान को पूरा करने के लिए शुरू किया गया था। इस योजना के तहत सहकारी और निजी दोनों तरह की चीनी मिलों को पहले वर्ष में 10 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया गया था। महाराष्ट्र सरकार ने घोषणा की थी कि, वह अगले चार वर्षों का ब्याज खुद वहन करेगी। उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार सरकार ने सब्सिडी की राशि दोनों प्रकार की मिलों को बताई थी, लेकिन भुगतान केवल सहकारी चीनी मिलों को ही किया गया।
यह मुद्दा पहले पेराई सत्र की नीति तय करने वाली मंत्रिस्तरीय समिति के सामने भी उठाया गया था। वेस्ट इंडिया शुगर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.बी. ठोंबरे ने इस मामले को समिति के सामने रखा था। समिति ने तब चीनी आयुक्त कार्यालय को एक महीने के भीतर प्रस्ताव पेश करने के निर्देश दिए थे, लेकिन उद्योग सूत्रों का कहना है कि कई साल बीत जाने के बाद भी सब्सिडी जारी नहीं की गई। इसके बाद निजी चीनी मिलों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने मिलों के पक्ष में फैसला देते हुए राज्य सरकार को सब्सिडी जारी करने का आदेश दिया। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी।
एक अन्य विवाद 2010–11 के पेराई सत्र से जुड़ा है। उस समय अतिरिक्त गन्ने की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने कम चीनी रिकवरी और गन्ना परिवहन के लिए वित्तीय सहायता देने की घोषणा की थी। निजी मिलों का कहना है कि उन्हें इस मद में भी कोई भुगतान नहीं मिला। इस मामले में भी हाईकोर्ट ने सरकार को सब्सिडी जारी करने का निर्देश दिया था, लेकिन उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार अभी भी लगभग 8.45 करोड़ रुपये बकाया हैं। ‘एग्रोवन’ के साथ बातचीत में बी.बी. ठोंबरे ने कहा कि, निजी चीनी मिलों के साथ कथित भेदभाव को तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार से लंबित सब्सिडी तुरंत जारी करने और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि, ‘विस्मा’ इस मामले को लगातार आगे बढ़ा रहा है।


















