ईरान संघर्ष से भारत समेत उभरते बाजारों के लिए बढ़ सकता है नया क्रेडिट जोखिम: फिच

नई दिल्ली: रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स के अनुसार, ईरान से जुड़ा संघर्ष भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई आर्थिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। इसका असर खासतौर पर ऊर्जा आयात, प्रवासी भारतीयों की भेजी जाने वाली रकम (रेमिटेंस), सरकारी सब्सिडी, विनिमय दर और अंतरराष्ट्रीय वित्त तक पहुंच पर पड़ सकता है।फिच ने कहा कि, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच तेल और गैस जैसे हाइड्रोकार्बन निर्यातक देशों को इससे कुछ सकारात्मक लाभ भी मिल सकता है।

एजेंसी के मुताबिक यदि स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज का संभावित बंद होना एक महीने से कम समय तक रहता है और क्षेत्र की तेल उत्पादन अवसंरचना को बड़ा नुकसान नहीं होता, तो उभरते बाजारों की क्रेडिट रेटिंग पर प्रभाव सीमित रहेगा। लेकिन यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है या इसके प्रभाव ज्यादा समय तक बने रहते हैं, तो इसका असर काफी गंभीर हो सकता है।फिच ने बताया कि, इस संघर्ष का सबसे सीधा असर तेल और गैस के आयात के माध्यम से पड़ता है, क्योंकि इससे वैश्विक ऊर्जा कीमतें प्रभावित होती हैं।

कई छोटे उभरते देशों में जीवाश्म ईंधन का शुद्ध आयात जीडीपी के बड़े हिस्से के बराबर है।फिच के अनुमान के अनुसार चिली, मिस्र, भारत, मोरक्को, पाकिस्तान, फिलीपींस, थाईलैंड और यूक्रेन में यह आयात जीडीपी के लगभग 3% या उससे अधिक के बराबर है।फिच ने कहा कि, जिन देशों की वित्तीय स्थिति पहले से दबाव में है, जैसे पाकिस्तान, या जिनका चालू खाता घाटा अधिक है, वहां आयात लागत बढ़ने का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है।

रेटिंग एजेंसी के अनुसार, यदि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो उन सरकारों पर राजकोषीय दबाव बढ़ेगा जो उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी देती हैं या ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के जवाब में नई सब्सिडी योजनाएं शुरू करती हैं।फिच ने यह भी कहा कि, खाड़ी क्षेत्र से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में यदि लंबे समय तक व्यवधान आता है, तो इससे वैश्विक निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हो सकता है और खासकर उच्च जोखिम वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए कर्ज जारी करना मुश्किल हो सकता है।

ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ने का दबाव भी बन सकता है, जिससे दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियों पर असर पड़ सकता है।फिच के अनुसार जिन देशों का खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) से आयात अधिक है, उन्हें सप्लाई चेन में व्यवधान का भी सामना करना पड़ सकता है, जिससे उत्पादन और कीमतों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

एजेंसी ने कहा कि, इस संघर्ष का असर अन्य कमोडिटी बाजारों पर भी पड़ सकता है।उदाहरण के लिए, खाड़ी क्षेत्र एल्यूमीनियम उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।इसके अलावा यह उर्वरक उद्योग के कच्चे माल के उत्पादन में भी अहम भूमिका निभाता है। यदि इससे वैश्विक खाद्य उत्पादन प्रभावित होता है, तो मध्यम अवधि में खाद्य महंगाई पर भी असर पड़ सकता है।

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