भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी सबसे बड़ी चिंता: रिपोर्ट

नई दिल्ली : एमके वेल्थ मैनेजमेंट की एक नई वित्तीय रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि,मिडिल ईस्ट में बढ़ता संघर्ष ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और बाजार की अस्थिरता के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण दबाव बना रहा है।रिपोर्ट में कहा गया है कि, इस संघर्ष में “कई देशों का जटिल जाल” शामिल है और इसका असर अनुमान से अधिक गंभीर हो सकता है।भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी है। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 65–70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है।यह उछाल क्षेत्र में प्रमुख ऊर्जा अवसंरचना को हुए नुकसान से जुड़ा है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ईरान की तेल अवसंरचना को नुकसान पहुंचा है। होरमुज जलडमरूमध्य बंद हो गया है। कतर से एलएनजी आपूर्ति रुक गई है। प्राकृतिक गैस की कीमतों में 50% की वृद्धि हुई है।रिपोर्ट के अनुसार, यदि युद्ध जारी रहता है तो 2026 के लिए एलएनजी उत्पादन में संभावित कमी दो सप्ताह में लगभग 3.30 मिलियन टन से लेकर एक महीने या उससे अधिक समय तक जारी रहने पर लगभग 11.20 मिलियन टन तक हो सकती है।

इन व्यवधानों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर सीधा असर पड़ता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, तेल की कीमतों में 10% की वृद्धि से जीडीपी वृद्धि दर लगभग 0.25% तक घट सकती है। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था “संरचनात्मक रूप से 7% की दर से बढ़ने के लिए तैयार है,” लेकिन रिपोर्ट चेतावनी देती है कि “कोई भी गंभीर नकारात्मक घटनाक्रम, खासकर बाहरी कारण, जीडीपी को लगभग 6.5% तक नीचे ला सकता है। ”इस संघर्ष का असर स्थानीय मुद्रा और निवेश बाजारों पर भी पड़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक,संघर्ष और युद्ध के समय रुपये की कीमत कमजोर हो जाती है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स और आभूषण जैसे आयातित सामान महंगे हो जाते हैं। इससे ऐसी स्थिति बनती है कि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और आयात लागत बढ़ने से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ेगा,” जिसके परिणामस्वरूप “बाजार में यील्ड बढ़ेगी और धन की लागत भी अधिक होगी।

हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद रिपोर्ट का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था लचीली बनी हुई है। इसमें कहा गया है कि, ऐसी गिरावट से स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था पहले भी ऐसी परिस्थितियों से गुजर चुकी है और उसने मजबूत लचीलापन दिखाया है। निवेशकों के लिए रिपोर्ट सुझाव देती है कि चूंकि बाजार में सुधारात्मक गिरावट आ चुकी है,इसलिए मौजूदा निवेश में चरणबद्ध तरीके से बढ़ोतरी करना समझदारी भरा कदम हो सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, मिडिल ईस्ट संघर्ष का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि यह कितने समय तक जारी रहता है। यदि यह केवल तीन–चार सप्ताह तक सीमित रहता है, तो इसका असर अस्थायी हो सकता है। लेकिन यदि यह एक–दो महीने या उससे अधिक समय तक चलता है, तो इसका नकारात्मक प्रभाव कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। (ANI)

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