तकनीक अपनाने और बेहतर बीज किस्मों से बढ़ा भारत में गेहूं और धान का उत्पादन

नई दिल्ली : पिछले पांच वर्षों में भारत में गेहूं और धान के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण खेती में नई उत्पादन और संरक्षण तकनीकों को अपनाना तथा उच्च उत्पादक और जलवायु-सहिष्णु बीज किस्मों का विकास है।यह जानकारी केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने दी।

उन्होंने शुक्रवार को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि, वर्ष 2024-25 में भारत का गेहूं उत्पादन 117.95 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 113.29 मिलियन टन से 4.65 मिलियन टन अधिक है। वर्ष 2020-21 में गेहूं उत्पादन 109.59 मिलियन टन था। इसी तरह 2024-25 में कुल धान उत्पादन 150.18 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 137.83 मिलियन टन से 12.36 मिलियन टन अधिक है। वर्ष 2020-21 में देश में धान उत्पादन 124.37 मिलियन टन था।

बिजनेसलाइन में प्रकाशित खबर के अनुसार, 16 फरवरी तक केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल का कुल भंडार क्रमशः 24.83 मिलियन टन और 35.26 मिलियन टन था, जबकि निर्धारित भंडारण मानक गेहूं के लिए 13.8 मिलियन टन और चावल के लिए 7.61 मिलियन टन है। चौधरी ने बताया कि, उत्पादन में बढ़ोतरी का कारण खेती का क्षेत्र बढ़ना और उत्पादकता में सुधार है। इसके साथ ही जैविक और अजैविक तनावों से निपटने के लिए नई तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इनमें जलवायु-अनुकूल उच्च उत्पादक किस्मों का विकास, कम लागत वाली और प्रभावी प्री-हार्वेस्ट व पोस्ट-हार्वेस्ट तकनीकें शामिल हैं।

ईरान को बासमती निर्यात पर असर…

पश्चिम एशिया में तनाव के बीच बासमती चावल के निर्यात पर पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि, जनवरी 2026 तक ईरान को बासमती निर्यात मूल्य के हिसाब से 11.57 प्रतिशत और मात्रा के हिसाब से 26.1 प्रतिशत बढ़ा है, जिससे ईरान के साथ बासमती व्यापार मजबूत बना हुआ है। हालांकि, 28 फरवरी से पश्चिम एशिया में शुरू हुए संघर्ष के कारण समुद्री और हवाई माल ढुलाई मार्गों में व्यवधान, माल ढुलाई लागत में वृद्धि, बंदरगाहों पर माल का जमा होना और लंबी परिवहन अवधि के कारण वित्तीय दबाव जैसी समस्याएं सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि सरकार पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और निर्यात पर असर कम करने के लिए कदम उठा रही है।

कपास किसानों के लिए ‘कपास किसान’ ऐप…

कपास किसानों को सशक्त बनाने के लिए कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने 1 सितंबर 2025 को ‘कपास किसान’ मोबाइल ऐप शुरू किया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत कपास की बिक्री अब इसी ऐप के माध्यम से की जा रही है। इस ऐप के जरिए किसान स्वयं पंजीकरण कर सकते हैं और चार सप्ताह की अवधि के लिए कपास बेचने के स्लॉट बुक कर सकते हैं। इससे किसानों को लचीलापन मिलता है, प्रतीक्षा समय कम होता है और खरीद केंद्रों पर भीड़ नहीं लगती। अब तक लगभग 42 लाख कपास किसान इस ऐप पर पंजीकरण कर चुके हैं।

रबर आयात…

प्राकृतिक रबर के आयात पर पूछे गए सवाल के जवाब में वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि 2024-25 में रबर आयात 5,50,918 टन रहा, जबकि 2021-22 में यह 5,46,369 टन था, यानी इस अवधि में कुल मिलाकर कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई। अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान प्राकृतिक रबर आयात 3,99,535 टन रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 4,85,666 टन की तुलना में 17.73 प्रतिशत कम है। उन्होंने कहा कि, रबर की कीमतें बाजार में मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होती हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतों का भी असर पड़ता है। अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान केरल के कोट्टायम में प्राकृतिक रबर (RSS-4 ग्रेड) की औसत कीमत 193.77 रुपये प्रति किलोग्राम रही, जबकि 2021-22 से 2024-25 के दौरान औसत कीमत 170.77 रुपये प्रति किलोग्राम थी।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड…

मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) के बारे में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में भागीरथ चौधरी ने बताया कि 2022-23 से 2024-25 के बीच किसानों को 1.73 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए गए हैं। नीति आयोग के 2025 के एक सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस योजना से उर्वरकों के असंतुलित उपयोग, खासकर यूरिया के अधिक इस्तेमाल, को कम करने और खेती की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है। सर्वे के अनुसार 68.5 प्रतिशत किसानों ने प्राकृतिक इनपुट के उपयोग के बाद मिट्टी की सेहत में स्पष्ट सुधार बताया, जबकि 25.7 प्रतिशत किसानों ने मामूली सुधार की जानकारी दी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here