पुणे: राज्य के 37 चीनी मिलों के को-जनरेशन प्रोजेक्ट्स से खरीदी गई बिजली का करीब 308 करोड़ रुपये का बिल महावितरण पर बकाया है। यह राशि आर्थिक तंगी से गुजर रही मिलों को देने के लिए राज्य सरकार को आदेश जारी करना चाहिए, ऐसी मांग महाराष्ट्र राज्य सहकारी साखर कारखाना संघ ने की है। हाल ही में मंत्रालय में चीनी उद्योग से जुड़े मुद्दों पर एक संयुक्त बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में साखर संघ की ओर से यह मांग रखी गई।
को-जनरेशन से बनने वाली बिजली का दर प्रति यूनिट 4 रुपये 50 पैसे से 4 रुपये 99 पैसे तय किया गया है, जो चीनी उद्योग के लिए काफी कम है। इसके अलावा यदि किसानों की बकाया बिजली राशि की वसूली नहीं की जाती तो बिजली दर में 5 प्रतिशत की कटौती कर दी जाती है। हालांकि, वास्तव में राज्य सरकार ने ही किसानों की बकाया बिजली राशि की वसूली न करने के लिए मुख्यमंत्री बळीराजा मुफ्त बिजली योजना–2024 लागू की है। इसलिए यह वसूली संभव नहीं है, ऐसा संघ ने स्पष्ट किया है। साथ ही गन्ना नियंत्रण आदेश 1966 के अनुसार एफआरपी (फेयर एंड रेम्युनरेटिव प्राइस) से इस प्रकार की कटौती को भी अवैध बताया गया है। यह बात सरकार के साथ हुई संयुक्त बैठक में भी स्पष्ट की गई।
राज्य में बिजली की कमी और नियमित आपूर्ति के अभाव के कारण लोड शेडिंग की गंभीर समस्या बनी हुई है। ऐसे समय में चीनी उद्योग ने सरकार को सहयोग देते हुए गन्ना खरीद करमाफी, भागभांडवल और 13 वर्षों तक बिजली खरीद की गारंटी जैसी सुविधाओं के आधार पर महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (एमएससीडीएल) के माध्यम से महंगे को-जनरेशन प्रोजेक्ट स्थापित किए थे। लेकिन अब इन प्रोजेक्ट्स को बिजली उत्पादन के लिए चालू रखना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसी स्थिति के कारण उत्तर प्रदेश की कई चीनी मिलें बिजली उत्पादन करने के बजाय बगास की बिक्री करना अधिक उचित समझ रहे हैं। इस मुद्दे की ओर भी साखर संघ ने सरकार का ध्यान आकर्षित किया है।


















