गन्ना का मूल्य संवर्धन कर कम लागत में अधिक मुनाफ़ा कमा रही है महिलायें

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर: कृषि ग्रामीण भारत की तरक्की की महत्वपूर्ण आर्थिक आधार है। गाँवों में इस आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा में महिलाएं है जो खेती कर अपना और परिवार का न केवल पेट पालती है बल्कि ग्रामीण भारत को तरक्की के अगले पायदान पर ले जाने का काम भी कर रही है। वैसे तो देश में सभी तरह के कृषि कार्यों में महिलाओं को योगदान अतुलनीय है लेकिन धान और गन्ना जैसी फ़सलों में महिला किसान और खेतीहर महिला श्रमिकों की भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण है। गन्ने की खेती के लिए अनुभवशील महिला कामगार की ज़रूरत होती है जो फ़सल की बुआई से लेकर फ़सल पकने और उसे बाज़ार तक ले जाने तक हर काम में अपनी भागीदारी निभाती है। गन्ने जैसी फ़सल में बुआई से लेकर पानी देने, खाद बीज डालने और फ़सल पकने पर कटाई करने के दौरान सिर्फ़ हुनरमंद महिलाएँ ही काम करती है। इसलिए गन्ना कटाई के दौरान श्रमिकों की समस्या बहुत रहती है। जो लेबर मिलते है वो ख़ाफी ज़्यादा पैसा लेते है क्योंकि सीज़न के समय काम की ज़्यादा माँग रहती है और दक्ष लैबर मिलते नहीं हैं।

देश के कृषि में महिलाओं की स्थिति पर बात करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ त्रिलोचन महापात्रा ने कहा कि
महिलाएँ कृषि की रीढ़ है। इनको दक्ष बनाने के लिये सरकार लगातार काम कर रही है। उन्होने कहा कि देश में कृषि के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का कोई वर्गीकृत आँकड़ा तो नहीं है लेकिन 2011 की जनगणना के अनुसार कृषि कार्यों में संलग्न महिलाओं की भागीदारी 3.60 करोड़ है। यह संख्या 30.33 प्रतिशत के करीब है। डॉ महापात्रा ने कहा कि देश में महिला कृषि मज़दूरों की संख्या की बात करे तो यह भी 6.15 करोड़ है जो 42.67 फ़ीसदी है। महापात्रा ने कहा कि सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि उन्हें दक्ष बनाने के लिए कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जाए। अभी तक तक़रीबन 50 लाख से ज़्यादा खेतीहर महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। ये महिलायें गन्ना, धान और अन्य फ़सलों की बेहतर तरीक़े से न केवल खेती कर रही है बल्कि इन फ़सलों का मूल्य संवर्धन कर कम लागत में अधिक मुनाफ़ा कमाकर आर्थिक रूप से सशक्त और मज़बूत भी बन रही है।

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