कोइम्बतुर : आंध्र प्रदेश के शुगर एवं केन कमिश्नर के निदेशक वी. वेंकट राव ने कहा कि, गन्ने की किस्मों का पुनर्जीवन आवश्यक है, ताकि किसानों को बेहतर उत्पादन मिल सके।दक्षिण भारत में “चीनी उद्योग: वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य की रूपरेखा” विषय पर आयोजित एक कार्यशाला में बोलते हुए उन्होंने कहा कि, मौजूदा किस्में बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं, इसलिए उन्हें पुनर्जीवित करने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि, परीक्षण किसानों के खेतों में ही किए जाने चाहिए और बीज उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जाना चाहिए। किसानों की यह भी मांग है कि ऐसी किस्में विकसित की जाएँ, जिनकी फसल पोंगल से पहले काटी जा सके।
दक्षिण भारतीय शुगर मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष आर. वरदराजन के अनुसार, गन्ना किसानों और शुगर मिलों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, ताकि दोनों को लाभ मिल सके। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बेची जाने वाली चीनी में से केवल 20% ही खुदरा बाजार में पहुँचती है, जबकि लगभग 70% चीनी संस्थागत खरीदारों द्वारा खरीदी जाती है और 10% सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से वितरित की जाती है। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ चीनी का उत्पादन खर्च अधिक है, लेकिन इसकी कीमतें कम बनी रहती हैं। यदि किसानों को गन्ने के लिए ₹4,000 प्रति टन मिलें, तो वे संतुष्ट होंगे। शुगर मिलें अपने कुल राजस्व का लगभग 70% किसानों को भुगतान करती हैं।
उन्होंने आगे कहा कि, किसानों और मिलों दोनों के खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन चीनी की बिक्री कीमत कम ही बनी हुई है। ईआईडी-पैरी के मुख्य परिचालन अधिकारी जे.ए. आधिक ने कहा कि, मिट्टी का स्वास्थ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। गन्ना दीर्घकाल में किसानों के लिए स्थिरता प्रदान करता है, लेकिन बेहतर उत्पादन तभी संभव है जब मिट्टी स्वस्थ हो।उन्होंने यह भी कहा कि, पर्याप्त किस्में उपलब्ध हैं और मशीनीकरण व मिट्टी का बेहतर स्वास्थ्य किसानों को अधिक आय दिला सकते हैं।
एसएनजे ग्रुप की उपाध्यक्ष जे. अनीथा ने उम्मीद जताई कि, राज्य में यह क्षेत्र जल्द ही फिर से प्रगति करेगा।आईसीएआर-गन्ना प्रजनन संस्थान के निदेशक पी. गोविंदराज ने कहा कि, प्रतिस्पर्धी फसलें गन्ने के लिए चुनौती बन रही हैं। इसलिए ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए, जिससे किसान प्रति एकड़ 60 टन उत्पादन हासिल कर सकें और गन्ने की खेती में टिके रह सकें।

















