पुणे : एलपीजी (तरलीकृत पेट्रोलियम गैस) संकट के बीच एथेनॉल को खाना पकाने के वैकल्पिक ईंधन के रूप में बढ़ावा देने की बात सामने आई है, लेकिन इसका व्यापक स्तर पर उपयोग सरकार की नीतिगत सहायता पर निर्भर करेगा। प्राज इंडस्ट्रीज के संस्थापक चेयरमैन प्रमोद चौधरी ने यह बात कही। एनडीटिव्ही प्रॉफिट में प्रकाशित खबर के मुताबिक एक टीवी इंटरव्यू में चौधरी ने कहा कि, खाना पकाने के लिए एथेनॉल का उपयोग कोई नई बात नहीं है और इसके लिए ज्यादा तकनीकी बदलाव की जरूरत भी नहीं है।
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ईरान से जुड़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित बाधाओं के कारण ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है। ऐसे में सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दे रही है, जिससे एथेनॉल जैसे विकल्पों पर फिर से ध्यान दिया जा रहा है, खासकर व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए।दुनिया के कई देशों में एथेनॉल स्टोव पहले से इस्तेमाल हो रहे हैं और इसके लिए मौजूदा ढांचे में बहुत कम बदलाव की जरूरत होती है। हालांकि, भारत में मांग और ठोस नीति समर्थन की कमी के कारण इसका उपयोग अभी सीमित है।
नीति की कमी बनी बाधा…
प्रमोद चौधरी ने बताया कि, पहले भी एथेनॉल से खाना पकाने को बढ़ावा देने की कोशिशें हुई थीं, लेकिन लगातार मांग नहीं होने के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सके। उन्होंने कहा कि, अब बेहतर तकनीक वाले स्टोव उपलब्ध हैं और अफ्रीका सहित कई देशों में इनका नियमित उपयोग हो रहा है।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी कदम…
उन्होंने कहा कि, एथेनॉल को केवल अल्पकालिक समाधान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह कम कार्बन उत्सर्जन वाला ईंधन है और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता है। उन्होंने यह भी कहा कि, जब तक कोई बड़ा संकट नहीं आता, तब तक आयातित ईंधन पर निर्भरता की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।
बायोफ्यूल के कई विकल्प तैयार…
चौधरी ने बताया कि, बायोफ्यूल के कई विकल्प तैयार हैं, लेकिन वे सरकार के फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। इनमें पेट्रोल में अधिक एथेनॉल मिश्रण, डीजल ब्लेंडिंग, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और कंप्रेस्ड बायोगैस शामिल हैं।उन्होंने कहा कि, एथेनॉल परियोजनाओं के प्रति उद्योग में रुचि बढ़ रही है और नई मांग तथा क्षमता विस्तार के लिए काफी संभावनाएं मौजूद हैं।

















