मुंबई: अगले पेराई सीजन में संभावित सूखे के कारण गन्ने की कमी और भारी कर्ज के दोहरे संकट की वजह से राज्य की आधी से ज्यादा चीनी मिलें बंद रहने की आशंका सहकार मंत्री बाबासाहेब पाटील ने मंगलवार को विधान परिषद में व्यक्त की। उन्होंने बताया कि, पिछले छह वर्षों में एफआरपी (Fair and Remunerative Price) छह बार बढ़ी है, जबकि चीनी की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) 31 रुपये पर स्थिर है, जिससे चीनी उद्योग पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।भाजपा के सदाभाऊ खोत ने विधान परिषद में चीनी मिलों में हो रही गड़बड़ियों, रिकवरी चोरी, घटतौली और मिल स्थापित करने के लिए 25 किलोमीटर की हवाई दूरी की शर्त को खत्म करने से संबंधित ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश किया।
‘एग्रोवन’ में प्रकाशित खबर के अनुसार, इस दौरान खोत ने मिल मालिकों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि, चीनी मिलों में अक्सर घटतौली की जाती है और रिकवरी चोरी करके गन्ना उत्पादक किसानों के साथ धोखाधड़ी की जाती है। चालू पेराई सत्र में औसतन कुल पेराई हुए गन्ने के वजन में 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। उन्होंने सुझाव दिया कि, राज्य सरकार को चीनी मिलों के बाहर जिला कलेक्टर और चीनी सह-निदेशक के नियंत्रण में वजन कांटे स्थापित करने चाहिए। इन कांटों को ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से सरकार के मुख्य सर्वर से जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही एकमुश्त एफआरपी कानून लागू करने की जरूरत है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि, गन्ने के सिरप और शीरे से एथेनॉल बनाने के कारण चीनी की रिकवरी कम हो जाती है।
इस पर सहकार मंत्री पाटील ने जवाब देते हुए कहा कि, सहकारी चीनी मिलों में लगाए गए वजन कांटों की जांच वैध मापन शास्त्र विभाग द्वारा की जाती है। इस सीजन में 210 में से 113 मिलों की जांच की गई है और निगरानी के लिए विशेष उड़नदस्ते भी नियुक्त किए गए हैं। अहिल्यानगर के एक मिल में गड़बड़ी पाई गई, जिस पर कार्रवाई की गई है।उन्होंने आगे कहा कि, रिकवरी और वजन घटने की चर्चा जरूर है, लेकिन इस वर्ष अधिक बारिश के कारण गन्ना हरा दिखाई देता है, जबकि उसकी रिकवरी काफी कम है। गन्ने की वृद्धि ठीक से नहीं हुई, इसलिए वजन में कमी दिखाई दे रही है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मिल मालिकों ने किसानों को लूटा है।
पाटील ने कहा कि, पूरी क्षमता से चलने के लिए मिलों को पर्याप्त गन्ना मिलना जरूरी है। अगर कच्चा माल ही नहीं मिलेगा तो यह उद्योग टिक नहीं पाएगा। इसी कारण 25 किलोमीटर की दूरी का नियम बनाया गया है। कई मिलों ने अपनी पेराई क्षमता बढ़ाई है। मिलों को कम से कम 150 दिन चलना चाहिए तभी प्रशासनिक खर्च निकल पाता है, लेकिन फिलहाल कई मिलों केवल 90 दिन ही चल रहे हैं। कई मिलों ने उप-उत्पाद बनाने के प्रोजेक्ट भी लगाए हैं, जिनके लिए भी कच्चे माल की जरूरत होती है। इसलिए 25 किलोमीटर की शर्त को किसी भी हालत में खत्म नहीं किया जा सकता।
एफआरपी देने के लिए कर्ज लेना मजबूरी…
गन्ना मूल्य नियंत्रण कानून के अनुसार चीनी मिलों के लिए एफआरपी देना अनिवार्य है। वर्ष 2019 में चीनी की एमएसपी 31 रुपये तय की गई थी और तब से उसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। दूसरी ओर एफआरपी छह बार बढ़ चुकी है। जब तक एमएसपी और एफआरपी को आपस में नहीं जोड़ा जाता, तब तक मिलों की समस्या हल नहीं होगी। एफआरपी देने के लिए मिलों को बैंकों से कर्ज लेना पड़ रहा है और ‘एनसीडीसी’ से भी ऋण लिया गया है। फिलहाल चीनी की मांग कम है और घरेलू बाजार के लिए कम कोटा मिलता है। राज्य के चीनी मिलों में बी-हेवी मोलासिस बनाने की क्षमता ज्यादा है, लेकिन राज्य को केवल 20 प्रतिशत का ही कोटा मिला है।उन्होंने कहा कि, इस संबंध में केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह से कोटा बढ़ाने की मांग की जाएगी। प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण राज्य की चीनी मिलें संकट में हैं और यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो अगले सीजन में केवल 50 प्रतिशत मिलें ही शुरू होने की संभावना है।


















