कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने पर केंद्र पर हर महीने 30,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ: रिपोर्ट

नई दिल्ली: यदि वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है, तो केंद्र सरकार के वार्षिक अतिरिक्त खर्च में करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हो सकती है। यह जानकारी एलारा सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में दी गई है।रिपोर्ट में कहा गया है कि, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के जल्द शांत होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं। इससे एशिया में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) भी प्रभावित हो सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, यदि पूरे वित्त वर्ष 2026-27 में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो भारत का चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी के लगभग 2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जबकि 70 डॉलर प्रति बैरल की स्थिति में यह लगभग 1 प्रतिशत रहता है। इसके साथ ही डॉलर-रुपया विनिमय दर कमजोर होकर 94-95 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच सकती है। इस स्थिति में केंद्र सरकार का वार्षिक अतिरिक्त खर्च लगभग 3.6 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में मार्च के मध्य के बाद भी व्यवधान जारी रहने, प्रभावित उत्पादक देशों से ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने में देरी और लगातार भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण भारत के बाहरी आर्थिक क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है।इन परिस्थितियों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है और सरकार के वित्तीय दबाव में वृद्धि हो सकती है।

यह अनुमान इस आधार पर लगाया गया है कि, तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को पेट्रोल और डीजल पर होने वाले घाटे की भरपाई के लिए सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती कर सकती है।साथ ही एलपीजी (रसोई गैस) पर सब्सिडी बढ़ने की संभावना भी शामिल की गई है।एलारा सिक्योरिटीज के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल बनी रहती है, तो संकट के हर अतिरिक्त महीने में केंद्र सरकार के वित्तीय बोझ में लगभग 30,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हो सकती है। यह मुख्य रूप से तेल विपणन कंपनियों के घाटे की भरपाई से जुड़ा होगा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि,लंबे समय तक संकट जारी रहने पर अर्थव्यवस्था पर दूसरे स्तर के प्रभाव भी पड़ सकते हैं। इनमें आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने से कर संग्रह में कमी शामिल है, जिससे सरकारी वित्तीय स्थिति पर और दबाव बढ़ सकता है।हालांकि रिपोर्ट के अनुसार, यदि संकट केवल एक महीने तक सीमित रहता है तो सरकार अपने आंतरिक वित्तीय संसाधनों से इसे संभाल सकती है। लेकिन यदि तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बने रहते हैं, तो इससे वित्तीय जोखिम बढ़ सकते हैं और सरकार को पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) में कटौती करनी पड़ सकती है।रिपोर्ट के मुताबिक, यह विश्लेषण तैयार करते समय कच्चे तेल की कीमत लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रही थी। (एएनआई)

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