सीतापुर : चीनी मिलों से निकलने वाली राख लंबे समय से प्रदूषण का कारण बनी हुई है, लेकिन अब इसका पर्यावरण-अनुकूल समाधान सामने आया है। सीतापुर की डालमिया रामगढ़ चीनी मिल ने राख से ईंटें बनाने की पहल कर एक मिसाल पेश की है। राख से तैयार की जा रही ये ईंटें पारंपरिक मिट्टी और सीमेंट की ईंटों की तुलना में अधिक मजबूत, टिकाऊ और सस्ती हैं।
जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार, रामगढ़ चीनी मिल की पेराई क्षमता 85 हजार क्विंटल प्रतिदिन है। मिल में चीनी और बिजली का उत्पादन होता है, जिससे बॉयलर से प्रतिदिन लगभग 30 टन राख निकलती है। पहले इस राख का उपयोग गड्ढों की भराई में किया जाता था, जिससे प्रदूषण की समस्या बढ़ रही थी। राख में मौजूद रासायनिक तत्व मिट्टी के लिए भी नुकसानदायक साबित हो रहे थे।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सख़्त निगरानी और बढ़ती शिकायतों के चलते राख के निस्तारण को लेकर चीनी मिल के सामने चुनौती खड़ी हो गई थी। इसी समस्या के समाधान के लिए मिल प्रबंधन ने राख से ईंट निर्माण की योजना पर काम शुरू किया। चीनी मिल में हाइड्रोलिक प्रेस लगाकर बॉयलर से निकलने वाली राख में तय अनुपात में पत्थर की रेत और सीमेंट मिलाकर ईंटें तैयार की जा रही हैं। पानी के छिड़काव से इन्हें मजबूती दी जाती है। मशीनों की मदद से ईंटों के साथ-साथ टाइलों का भी उत्पादन किया जा रहा है।
राख से बनी ये ईंटें न सिर्फ मजबूत हैं, बल्कि इनमें सीलन का असर भी नहीं होता। प्रति ईंट निर्माण की लागत लगभग छह रुपये आती है। मिल प्रतिदिन करीब 10 हजार ईंटों का उत्पादन कर रही है, जिन्हें गन्ना किसानों को छह रुपये प्रति ईंट की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है। इस पहल से जहां किसानों को कम कीमत पर मजबूत ईंटें मिल रही हैं, वहीं चीनी मिल को भी अतिरिक्त आय हो रही है। साथ ही, राख का सुरक्षित निस्तारण होने से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है। वरिष्ठ महाप्रबंधक उमाकांत पाठक ने बताया कि चीनी मिल से निकलने वाली राख का ईंट निर्माण में उपयोग पर्यावरण के लिए लाभकारी है और इससे किसानों को सीधा फायदा मिल रहा है।
















