पुणे: महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों ने राज्य सरकार से ₹500 प्रति टन की सहायता देने का आग्रह किया है ताकि वे फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) के अंतर को पूरा कर सकें और मजदूरों के बकाया भुगतान कर सकें। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक, महाराष्ट्र कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज फेडरेशन के एक पदाधिकारी ने बताया की महाराष्ट्र में 100 से अधिक सहकारी चीनी मिलें हैं और कुल बकाया राशि ₹8,000 करोड़ से अधिक हो चुकी है। वहीं केवल FRP का बकाया लगभग ₹4,900 करोड़ तक पहुंच गया है।
उन्होंने कहा, गन्ने का FRP ₹3,550 प्रति टन है, जबकि बैंकों से हमें ₹2,440 प्रति टन ही मिलता है। यानी ₹1,160 प्रति टन का अंतर है। शुगर कमिश्नर के कार्यालय के अनुसार, राज्य में FRP का बकाया ₹4,900 करोड़ तक पहुंच गया है। अगर कटाई मजदूरों और परिवहन का भुगतान भी जोड़ दिया जाए तो कुल वित्तीय बकाया ₹8,000-9,000 करोड़ तक पहुंच जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि, पंजाब और कर्नाटक सरकारों ने अपने राज्यों की सहकारी चीनी मिलों को सहायता देने की पहल की है।
अधिकारी ने कहा, पंजाब सरकार ने गन्ने पर ₹685 प्रति टन की सहायता की घोषणा की है और कर्नाटक ने भी समर्थन दिया है। महाराष्ट्र की सहकारी चीनी उद्योग ने गन्ना किसानों के भुगतान को प्राथमिकता दी, लेकिन परिवहन और कटाई मजदूरों के भुगतान अभी भी बाकी हैं। उन्होंने कहा कि, मौजूदा वैश्विक संघर्ष के कारण निर्यात से ज्यादा फायदा नहीं होगा क्योंकि इससे परिवहन की समस्याएं पैदा होती हैं। उन्होंने कहा कि, घरेलू बाजार में कीमतें अच्छी हैं, इसलिए प्राथमिकता घरेलू बाजार में बिक्री करने की है।
अधिकारी के अनुसार, फेडरेशन ने राज्य के सहकारिता विभाग के माध्यम से मदद मांगी है और इस मुद्दे पर बैठकें भी की हैं। उन्होंने कहा, हमने कुछ मांगें रखी हैं, जिनमें FRP के अंतर को पूरा करने और बकाया चुकाने के लिए गन्ने पर ₹500 प्रति टन सहायता और कटाई मजदूरों के सुचारू संचालन के लिए शुगर और कृषि आयुक्तों की एक समिति बनाने की मांग शामिल है।विभाग ने चीनी मिलों की समस्याओं पर चर्चा के लिए मुख्यमंत्री से समय मांगा है।


















