कोल्हापुर: महाराष्ट्र की चीनी मिलों का पेराई सीजन 2021-22 के उच्चतम 167 दिनों से सिकुड़कर अब केवल 100 दिन रहा गया है।यह मुद्दा अब चीनी उद्योग के लिए चिंता का विषय बन गया है। पिछले दस सालों की बात की जाए तो चीनी मिलों की पेराई क्षमता 2015-16 के प्रतिदिन 6.85 लाख टन से बढकर 2025-26 सीजन तक 10.45 लाख टन तक पहुंच गई है। लेकिन गन्ना क्षेत्र 2021-22 के 14.88 लाख हेक्टेयर से गिरकर 2025-26 सीजन तक 13.73 लाख हेक्टेयर हुआ है। साथ ही चीनी मिलों की संख्या भी 2014-15 के 178 (99 सहकारी और 79 निजी) से बढ़कर 2025-26 तक 208 (99 सहकारी और 101 निजी) तक पहुँच गई।वर्तमान 2025-26 सीजन में यह आंकड़ा बढकर 208 तक पहुँच गया है।प्रदेश का पेराई सीजन सिकुड़ने में यह सभी कारक जिम्मेदार है।
राज्य की 178 शुगर मिलों की कुल पेराई क्षमता 2015-16 में लगभग 6.85 लाख टन प्रतिदिन थी। यह क्षमता 2025-26 सीजन में सीधे 10.45 लाख टन तक पहुंच गई है। पुरानी मिलों द्वारा पेराई क्षमता बढ़ाने के कारण पेराई के लिए अब गन्ना कम पड़ रहा हैं। पिछले दस सालों में पेराई क्षमता में पचास प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है। इस वजह से, जो शुगर सीजन औसतन 145 से 150 दिन चलता था, वह 2024-25 में 100-102 दिन तक सीमित हो गया है।बढ़ती पेराई क्षमता की तुलना में गन्ने के रकबे में उम्मीद के मुताबिक बढ़ोतरी न होने के कारण शुगर इंडस्ट्री पर सीधा असर पड़ा है।
चीनी इंडस्ट्री के जानकार सरकार मदद की गुहार लगा रहा है। फैक्ट्रियों द्वारा बड़े पैमाने पर बढ़ाई गई पेराई कैपेसिटी अब अवसर से जादा आपदा बन गई है।राज्य की कुछ 8 से 10 मिलें छोड़कर अन्य मिलें पूरी क्षमता से चलने में नाकाम रही है, और इससे उनका आर्थिक हिसाब-किताब बिगड़ गया है। चीनी आयुक्तालय द्वारा जारी किये गये डेटा से पता चलता है की, पिछले दस सालों में मिलें बढ़ गई, मिलों की पेराई क्षमता बढ़ गई, लेकिन गन्ना क्षेत्र बढ़ने की बजाय घट गया है।
चीनी सीजन और गन्ने की खेती का एरिया (लाख हेक्टेयर) दिया गया है। सीजन 2014-15 (10.54 लाख हेक्टेयर), 2015-16 (9.87), 2016-17 (6.33), 2017-18 (9.02), 2018-19 (11.62), 2019-20 (8.22), 2020-21 (11.42), 2021-22 (14.88), 2022-23 – (14.87), 2023-24 (14.07), 2024-25 (13.73) पिछले 10 सालों के गन्ना पेराई (लाख मेट्रिक टन) के आंकड़े आगे दिए गए है… 2014-15 (930.76 L.M.T.), 2015-16 (742.96), 2016-17 (373.13), 2017-18 (953.53), 2018-19 (952.11), 2019-20 (550.30), 2020-21 (1014.42), 2021-22 (1322.32), 2022-23 – (1053.91), 2023-24 (1076.18), 2024-25 (850.1)


















