पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबे समय तक चला तो भारत की आर्थिक वृद्धि को कर सकता है धीमा: SBI रिसर्च

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर कई तरह का असर पड़ सकता है। खासकर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, ऊर्जा आपूर्ति मार्गों में बाधा और रेमिटेंस (विदेश से आने वाले पैसे) व व्यापार पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है। यह बात SBI रिसर्च की एक नई रिपोर्ट में कही गई है।रिपोर्ट में कहा गया है कि, मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष का तत्काल महंगाई पर असर सीमित रह सकता है, लेकिन अगर तनाव लंबे समय तक बना रहा और सप्लाई चेन में रुकावट आई तो इससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर बड़ा असर पड़ सकता है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि, अगर तनाव के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यह दुनिया का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी करीब 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है। इसमें से लगभग 5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन में से करीब 2 मिलियन बैरल तेल हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है।अगर यह मार्ग बंद होता है या बाधित होता है तो भारत को तेल की आपूर्ति में कमी और आयात लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है।

दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत इसी संकरे जलमार्ग से गुजरता है, जिससे यह वैश्विक स्तर पर तेल परिवहन के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में से एक है। बढ़ते तनाव का असर वैश्विक तेल बाजारों पर पहले ही दिखाई देने लगा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत दिसंबर 2025 में लगभग 58.92 डॉलर प्रति बैरल और फरवरी 2026 के अंत में 70.75 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मार्च 2026 की शुरुआत में करीब 85.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने के कारण यह 89 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई।

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का भारत की अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। SBI रिसर्च के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमत हर 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) लगभग 36 बेसिस पॉइंट बढ़ सकता है। तेल की बढ़ती कीमतों से कॉस्ट-पुश महंगाई भी बढ़ सकती है, जिससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई लगभग 35–40 बेसिस पॉइंट बढ़ सकती है।

आर्थिक वृद्धि पर भी इसका असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत की GDP वृद्धि लगभग 20–25 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकती है। सबसे खराब स्थिति में अगर कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तो वित्त वर्ष 2027 में भारत की GDP वृद्धि अनुमानित 7 प्रतिशत से घटकर करीब 6 प्रतिशत रह सकती है।

रिपोर्ट में विदेश से आने वाली रेमिटेंस पर भी जोखिम की बात कही गई है, खासकर खाड़ी देशों से आने वाले पैसों को लेकर।भारत को वित्त वर्ष 2025 में लगभग 138 अरब डॉलर की व्यक्तिगत रेमिटेंस प्राप्त हुई, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 119 अरब डॉलर थी। इनमें से करीब 38 प्रतिशत रेमिटेंस खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों से आती है, इसलिए यह क्षेत्र की आर्थिक स्थिति और तेल की कीमतों से प्रभावित हो सकती है।

लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापार को भी प्रभावित कर सकता है।GCC देश भारत के कुल निर्यात का 13 प्रतिशत से अधिक और आयात का 16 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रखते हैं। वहीं अन्य पश्चिम एशियाई देशों का भारत के निर्यात में लगभग 2 प्रतिशत और आयात में करीब 4 प्रतिशत हिस्सा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, भारतीय बैंकों और निजी क्षेत्र की कंपनियों का भी इस क्षेत्र में अच्छा-खासा निवेश और संपर्क है, इसलिए अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो इससे अतिरिक्त जोखिम पैदा हो सकता है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने आपूर्ति से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश ने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाई है और फिलहाल 40 से अधिक देशों से तेल आयात करता है। 2022 के बाद रूस से तेल खरीद भी बढ़ाई गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और ओपन मार्केट ऑपरेशंस जैसे कदमों ने वित्तीय बाजारों को स्थिर रखने और रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद की है। कुल मिलाकर रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्पकाल में भारत अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में है, लेकिन अगर पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा खिंचता है तो मध्यम अवधि में तेल की कीमतों, व्यापार प्रवाह और व्यापक आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है। (ANI)

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