केप टाउन : दक्षिण अफ्रीका का चीनी उद्योग बढ़ते आयात के कारण गंभीर संकट का सामना कर रहा है। उद्योग संगठन एसए कैनेग्रोवर्स का कहना है कि, विदेशों से बड़ी मात्रा में आ रही चीनी स्थानीय उत्पादन को कमजोर कर रही है और हजारों श्रमिकों की आजीविका पर खतरा पैदा कर रही है। रिपोर्टों के अनुसार, केवल जनवरी 2026 में ही ब्राज़ील, भारत और थाईलैंड जैसे देशों से करीब 24,600 टन से अधिक चीनी दक्षिण अफ्रीका में आयात की गई। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि एक ही महीने में हुआ यह आयात वर्ष 2020, 2021 और 2022 के पूरे साल के आयात से भी अधिक है।यह जानकारी SARS के आंकड़ों के आधार पर एसए कैनेग्रोवर्स ने दी है।
इस बढ़ते संकट को देखते हुए उद्योग के नेताओं ने राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा से अपील की है कि वे ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लुला दा सिल्वा के साथ इस मुद्दे को उठाएं। एसए कैनेग्रोवर्स के अध्यक्ष हिगिंस म्दलुली ने कहा, हम राष्ट्रपति रामाफोसा से आग्रह करते हैं कि वे ब्राज़ील से चीनी आयात तुरंत रोकने के लिए कदम उठाएं। दक्षिण अफ्रीका के पास खुद पर्याप्त चीनी उत्पादन की क्षमता है, लेकिन आयात हमारे उद्योग को नुकसान पहुंचा रहा है।
पिछले वर्ष दक्षिण अफ्रीका में लगभग 2 लाख टन परिष्कृत चीनी आयात की गई, जो वैश्विक बाजार में कम कीमतों, रैंड-डॉलर की अनुकूल विनिमय दर और स्थानीय आयात शुल्क सुरक्षा के कमजोर होने के कारण बढ़ी है। 2026 के शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि, यह रुझान कम होने के बजाय और तेज हो रहा है। म्दलुली ने कहा कि, आयातित परिष्कृत चीनी स्थानीय बाजार से घरेलू स्तर पर उगाई और उत्पादित चीनी को बाहर कर रही है। इससे आर्थिक नुकसान भी बड़ा है। आयात के कारण स्थानीय उद्योग को प्रति टन करीब 7,000 रैंड का नुकसान हो रहा है, जिससे 2025-26 सीज़न में लगभग 1.5 अरब रैंड का घाटा होने का अनुमान है।
इसका असर केवल उद्योग तक सीमित नहीं है। दक्षिण अफ्रीका का चीनी क्षेत्र 10 लाख से अधिक लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है और खासकर क्वाज़ुलु-नटाल और म्पुमलंगा जैसे ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।म्दलुली ने कहा कि, आयातित और सब्सिडी वाली चीनी से प्रतिस्पर्धा के लिए मजबूत शुल्क ढांचे की आवश्यकता है ताकि स्थानीय उत्पादकों, श्रमिकों और समुदायों को संरक्षण मिल सके।
हालांकि, केवल बढ़ते आयात ही समस्या नहीं हैं। चीनी कंपनी टोंगाट हुलेट के संभावित दिवालियापन और बढ़ती तेल कीमतों ने भी उद्योग के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह कंपनी दक्षिण अफ्रीका में तीन मिलें संचालित करती है और देश की एकमात्र स्वतंत्र चीनी रिफाइनरी है, जो खाद्य और पेय उद्योग के लिए आवश्यक गुणवत्ता की चीनी तैयार करती है। म्दलुली ने कहा कि टोंगाट हुलेट संकट का समाधान उद्योग की स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि अगर कंपनी को बचाने का समाधान मिल भी जाए, तो उसे ऐसे नियामकीय ढांचे में काम करना होगा जो विदेशी आयात के खिलाफ मजबूत सुरक्षा प्रदान करे।


















