मक्के से बने एथेनॉल की कीमतों में सालाना 11.7% की बढ़ोतरी, फिर भी धान की खेती मक्के की ओर नहीं हुई शिफ्ट : इकोनॉमिक सर्वे

नई दिल्ली : इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, FY25 तक मक्का-एथेनॉल की कीमतों में 11.7 प्रतिशत CAGR की बढ़ोतरी के बावजूद, यह धान की खेती को कम करने में नाकाम रहा। इसके बजाय, ऐसा लगता है कि इससे अनजाने में दालों के उत्पादन में गिरावट आई है। सरकार सालाना फीडस्टॉक के हिसाब से अलग-अलग प्रति लीटर एथेनॉल की कीमतें तय होती है। हालांकि, मक्के से एथेनॉल बनाने वालों पर किसानों को तय कीमत देने की कोई मजबूरी नहीं है, लेकिन चीनी आधारित यूनिट्स को सरकार द्वारा तय दर पर गन्ना खरीदना होता है। फिर भी, सर्वे का कहना है कि, इस नीति का मकसद किसानों को आय का ‘स्थिर’ स्रोत देना है।

द हिंदू में प्रकाशित खबर के मुताबिक सर्वे में कहा गया है की, “FY22 और FY25 के बीच, मक्के से बने एथेनॉल की तय कीमत में 11.7 प्रतिशत CAGR की बढ़ोतरी हुई, जो चावल या मोलासेस से बने एथेनॉल की तुलना में काफी तेज़ी से बढ़ी। इससे मक्के के पक्ष में एक मजबूत और लगातार कीमत का संकेत मिला है। उम्मीद थी कि, इससे धान की खेती मक्के की ओर शिफ्ट होगी, क्योंकि पहले में अतिरिक्त स्टॉक था और बाद वाले में कम पानी लगता है… धान की खेती में अपेक्षित कमी नहीं हुई है।लेकिन इसी अवधि के दौरान, दालों के उत्पादन और खेती में गिरावट आई है।

2024-25 फसल वर्ष (जुलाई-जून) में, धान का रकबा 7.5 प्रतिशत बढ़कर 514.2 लाख हेक्टेयर (lh) हो गया, जिससे भारत चावल उत्पादन में पहले नंबर पर पहुँच गया। हालांकि, 2024-25 में मक्के का रकबा भी 6.9 प्रतिशत बढ़कर 120.2 lh हो गया। लेकिन, दालों का रकबा पिछले साल 276.2 lh पर स्थिर रहा। सर्वे में कहा गया है कि, मक्के की पैदावार FY16 में 2.56 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर FY25 तक 3.78 टन प्रति हेक्टेयर हो गई और इस बढ़ोतरी का श्रेय एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को दिया गया। उत्पादकता में इन फायदों से मक्का किसानों के लिए कई अन्य अनाज और दालों की तुलना में स्वाभाविक रूप से एक आकर्षक फसल बन जाता है, भले ही कोई नीतिगत हस्तक्षेप न हो। हालांकि, इसमें यह भी बताया गया है कि सोयाबीन, सूरजमुखी के बीज, रेपसीड, मूंगफली और बाजरा जैसी फसलों की पैदावार इसी अवधि में या तो स्थिर रही है या कम हुई है।

इसी समय, सर्वे में कहा गया है कि, भारत का एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (EBP) हाल के वर्षों में देश की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया है। इसमें कहा गया है, EBP कार्यक्रम ने कच्चे तेल के विकल्प, विदेशी मुद्रा के कम खर्च, कम उत्सर्जन और किसानों को ज्यादा भुगतान के मामले में ठोस फायदे दिए हैं।

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