वाराणसी: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और आईआईटी-बीएचयू के शोधकर्ताओं की एक टीम ने गेहूं की फसल में रोग प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए ग्रीन नैनोटेक्नोलॉजी पर आधारित एक नया तरीका विकसित किया है।’टीओआई’ में प्रकाशित खबर के मुताबिक, बीएचयू के विज्ञान संस्थान के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रशांत सिंह और उनकी टीम ने आईआईटी-बीएचयू के स्कूल ऑफ मटेरियल्स साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर यह शोध किया। शोध में पाया गया कि, जिंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल्स, फफूंद जनित रोग स्पॉट ब्लॉच के खिलाफ गेहूं में रक्षा-प्रेरक (डिफेंस प्राइमिंग एजेंट) के रूप में काम कर सकते हैं।
डिफेंस प्राइमिंग एक विशेष रणनीति है, जिसमें पौधों को इस तरह तैयार किया जाता है कि वे तनाव या रोग के समय तेज़ और अधिक प्रभावी प्रतिक्रिया दे सकें, जबकि सामान्य परिस्थितियों में उन्हें ऊर्जा खर्च करने वाले रक्षा तंत्र सक्रिय नहीं करने पड़ते।शोध टीम में निधि यादव, वंदना देवी, पी. थिरुनारायणन, संजीव कुमार, चंदन उपाध्याय और प्रशांत सिंह शामिल थे। टीम ने यह अध्ययन किया कि, ग्रीन-सिंथेसाइज्ड जिंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल्स किस तरह पौधों की प्रतिरक्षा और वृद्धि को बेहतर बना सकते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि, जिन गेहूं के पौधों पर इन नैनोपार्टिकल्स का प्रयोग किया गया, वे सामान्य परिस्थितियों में स्वस्थ रहे और जब उन्हें रोगजनक के संपर्क में लाया गया तो उन्होंने अधिक मजबूत प्रतिरोधक क्षमता दिखाई।ऐसे “प्राइम्ड” पौधों में बेहतर वृद्धि, अधिक स्वस्थ पत्तियां और मजबूत जैव-रासायनिक रक्षा प्रतिक्रियाएं देखी गईं। इतना ही नहीं, इन पौधों से उत्पन्न अगली पीढ़ी के गेहूं के पौधों में भी बेहतर सहनशीलता और प्रदर्शन पाया गया।
प्रशांत सिंह के अनुसार, यह शोध दिखाता है कि ग्रीन नैनोटेक्नोलॉजी का उपयोग पर्यावरण-अनुकूल और प्रभावी फसल सुरक्षा रणनीतियां विकसित करने में किया जा सकता है। यह तरीका स्थिरता के तीन प्रमुख स्तंभ—लोग, पर्यावरण और लाभ (People, Planet, Profit)—के अनुरूप है, क्योंकि इससे खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है, कृषि पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा होती है और किसानों की उत्पादकता में सुधार होता है।इस शोध के निष्कर्ष नीदरलैंड्स की पत्रिका Plant Nano Biology में प्रकाशित किए गए हैं।

















