कीटों से गन्ना फसल की सुरक्षा किये जाने के लिए एडवाइजरी जारी

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश के आयुक्त, गन्ना एवं चीनी, श्री संजय आर. भूसरेड्डी ने गन्ना कृषकों के हितों के दृष्टिगत मौसम के उतार-चढ़ाव के दौरान उत्पन्न होने वाले विभिन्न कीटों जैसे पायरिला, ग्रास हाॅपर, फाॅल आर्मीवर्म, तथा काला चिकटा से गन्ना फसल की सुरक्षा एवं प्रबंधन हेतु समस्त विभागीय अधिकारी एवं चीनी मिलों के प्रबन्धन को एडवाइजरी जारी की है।

इस संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हुए श्री भूसरेड्डी ने बताया कि वातावरण में अधिक नमी होने और तापमान में दिन-प्रतिदिन अत्यधिक उतार-चढ़ाव के कारण पनपने वाले विभिन्न कीट जैसे पायरिला, ग्रास हापर, फाॅल आर्मी तथा काला चिकटा गन्ने की फसल हेतु एक अभिषाप हैं। गन्ना फसल मे इन कीटों की समयानुसार जाॅच एवं निरीक्षण कर तत्काल उनके रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाया जाना अति आवष्यक है अन्यथा पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। यही नहीं आस-पास के खेतों में खड़ी गन्ना फसल भी प्रभावित होती है जिससे गन्ना कृषकों की कड़ी मेहनत एवं लागत दोनों की क्षति हो जाती है।

गन्ना आयुक्त ने एडवाइजरी के माध्यम से सभी विभागीय अधिकारियों को निर्देषित किया है कि वह अपने अधीनस्थ जनपदों में स्थलीय निरीक्षण कराते हुए कीटों की जाॅच गन्ना शोध परिषद के वैज्ञानिकों से कराकर रोकथाम की उचित व्यवस्था करायें। यह भी निर्देषित किया गया है कि गन्ना किसानों को इन कीटों के बारे में विस्तृत जानकारी एवं उनसे बचाव के उपायों के सम्बन्ध में जागरूक करते हुए प्राकृतिक नियंत्रण पर जोर भी दिया जाए।

गन्ना आयुक्त द्वारा पायरिला कीट की रोकथाम के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया गया कि जिन क्षेत्रों में पायरिला का प्रकोप ज्यादा पाया जाए तो उन क्षेत्रों का विषेष ध्यान देते हुए उसकी तुरन्त रोकथाम के लिए उ.प्र. गन्ना शोध परिषद से तत्काल सम्पर्क स्थापित कर यथा आवष्यक कार्यवाही सुनिष्चित की जाए। जिन खेतों में पायरिला के प्राकृतिक शत्रु की संख्या नगण्य है वहाॅ उ.प्र. गन्ना शोध परिषद की संस्तुति के अनुरूप चीनी मिलों द्वारा पावर स्प्रेयर से वृहद स्तर पर सुरक्षात्मक कीटनाषी इमिडाक्लोप्रिड 150-200 मिली अथवा प्रोफेनोफास 750 मिली को 600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करायें।

उन्होनें बताया कि काला चिकटा अधिकतर पेड़ी में पाया जाता है इससे प्रभावित पौधों की पत्तियाँ पीली हो जाती हैं तथा उन पर कत्थई रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इसके षिषु पत्रकंचुक एवं गोंफ के मध्य तक पाये जाते हैं। प्रौढ़ तथा षिषु दोनों पत्तियों का रस चुसते हैं जिससे गन्ने की बढ़वार रूक जाती है तथा उपज व शर्करा में कमी हो जाती है। ग्रीष्मकाल में प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8प्रतिषत घोल दर 150-200 मि.ली/हे. अथवा क्वीनाॅलफास 25 प्रतिषत ई.सी. दर 800 मि.ली./हे. या डाइक्लोरवास 76 प्रतिषत ई.सी. दर 250 मि.ली./हे. कीटनाषक का छिड़काव 625 ली. पानी में घोलकर कट नाजिल से करना चाहिए।
उन्होनें यह भी बताया कि किसी क्षेत्र विशेष में फाॅल आर्मीवर्म कीट की उपस्थिति परिलक्षित होने पर प्रभावित पौधो को नष्ट करने, जमीन की गुड़ाई करने तथा इस क्षेत्र का गन्ना बीज, बुवाई हेतु प्रयोग में न लाने की सलाह दी गई है। इस कीट के प्रभाव के आरम्भिक चरण में नीम के तेल का प्रयोग कर अंडे देने की प्रक्रिया और लार्वा पोषण को रोका जा सकता है। इस कीट का प्रकोप होने पर क्लोरपाइरोफास एवं मोनोक्रोटोफास दवा का 2 से 3 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

गन्ना आयुक्त द्वारा विभागीय अधिकारियों को यह भी निर्देषित किया गया है कि काला चिकटा, ग्रास हाॅपर, फाॅल आर्मीवर्म तथा पायरिला प्रभावित क्षेत्रों में सघन अभियान चला कर कृषकों से जन सम्पर्क करके कीटों के बचाव के सम्बन्ध मे गोष्ठियों का आयोजन करायें, साथ ही एस.एम.एस. भेजकर एवं प्रचार साहित्य द्वारा गन्ना कृषकों को जागरूक करें।

 

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