WTO की अपीलीय निकाय ठप होने से भारतीय चीनी उद्योग को थोड़ी राहत

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भारत की चीनी निर्यात सब्सिडी के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन में ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) का दरवाजा खटखटाया था। प्रतिद्वंद्वी देशों का आरोप है कि भारत की चीनी सब्सिडी वैश्विक व्यापार नियमों के साथ असंगत है और चीनी बाजार को विकृत कर रही है। लेकिन अब ऐसा लगता है की देश में चीनी उद्योग विवादित चीनी निर्यात को जारी रख सकता है, क्यूंकि WTO की अपीलीय निकाय अब व्यापार विवाद पर काम नहीं कर पायेगी।

दो न्यायाधीशों का कार्यकाल दस दिसंबर को समाप्त होने के बाद WTO की अपील निकाय 11 दिसंबर को ठप हो गई। अपीलीय निकाय में सात मेंबर्स की टीम होती है और कम से कम तीन न्यायाधीशों की जरुरत होती है, लेकिन दो के जाने के बाद, अब सिर्फ एक न्यायाधीश ही बचा है, जो WTO के नियमों के तहत निर्णय लेने के लिए पर्याप्त नहीं है।

आपको बता दे, पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका ने WTO के अपीलीय निकाय में नए सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल पूरा कर चुके सदस्यों की पुनः नियुक्ति का मार्ग अवरुद्ध कर रखा है। अमेरिका का मानना है कि विश्व व्यापार संगठन का व्यवहार पक्षपातपूर्ण रहा है।

चीनी उद्योग के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह भारत के लिए राहत पूर्ण है। क्यूंकि कई देशों ने भारत की चीनी सब्सिडी को लेकर WTO की तरफ रुख किया था , जो मामला अभी भी चल रहा है। भारत का कहना है कि उसकी सब्सिडी WTO के नियमों के अनुरूप है। भारतीय चीनी उद्योग पिछले दो से तीन वर्षों से विभिन्न बाधाओं से जूझ रहा है, और इस क्षेत्र को संकट से बाहर लाने के लिए सरकार ने सॉफ्ट लोन योजना, न्यूनतम बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी, निर्यात शुल्क में कटौती, आयात शुल्क में 100 प्रतिशत वृद्धि जैसे विभिन्न उपाय उठाये हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, WTO को अपीलीय निकाय को कार्यात्मक बनाने में कुछ महीने लगेंगे और उम्मीद है कि 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के पूरा होने के बाद ऐसा होगा।

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