मिठे गन्ने का कडवा सच..!

नई दिल्ली : चीनी मंडी 
देश में से कई सारी चीनी मिलें गन्ना उत्पादकों का  हजारों करोड़ का भुगतान करने  में अभी तक असफल रही है  है। उसकी वजह से किसान परेशान है और अब गन्ने की बकाया राशी का मुद्दा चुनावी गलियारों में भी तुल पकड़ रहा है. अमरजीत थिंड का कहना हैं कि, गन्ने का बकाया रख कर चीनी मिलों ने बेबस किसानों के सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। इसका परिणाम  पंजाब समेत राजनीतिक रूप से संवेदनशील देश के कई राज्य के गन्ना बेल्ट में आज और आनेवाले समय में साफ़ दिखाई देगा।
पंजाब में ७५० करोड़ का बकाया
यह एक ऐसी फसल के लिए एक विडंबना है जो दुनिया भर के लाखों लोगों को मिठास लाती है, लेकिन उस फसल को पैदा करनेवाले  किसानों के मुंह में कड़वा स्वाद छोड़ देता है। पूरे देश में लाखो गन्ना किसानों का चीनी मिलों के पास कई हज़ार करोड़ रूपए का बकाया है। अकेले पंजाब के गन्ना उत्पादकों को चीनी मिलों से 750 करोड़ रुपये से ज्यादा की वसूली करनी है। महाराष्ट्र, उत्तेर प्रदेश, कर्नाटक के किसानों की हालत भी बकाया रकम की वजह से बहुत ही खस्ता हालत हुई है. कर्नाटक में तो लोकायुक्त ने हस्तक्षेप करते हुए जल्द से जल्द किसानों का बकाया चुकता करने के आदेश दिए है ।
वोट बैंक की राजनीती से नुकसान
कई चीनी मिल मालिक अपनी राजनीतिकत ताकद का इस्तेमाल करके किसानों का बकाया चुकता करने में देरी कर रहे है, इसके लिए राज्य सरकारोंको आगे आकर किसानों को तसल्ली देनी पड़ रही है । कोई भी किसान उसके किसी भी ऋण में छूट नहीं चाहते हैं, वो तो सिर्फ उनके गन्ने का सही दाम सही वक़्त पर मिलने की मांग कर रहे है । हालाकि आधिकारिक उदासीनता और वोट बैंक की राजनीति ने देश में गन्ने की खेती को बर्बाद कर दिया है।
 464 मिलों के पास 15,593 करोड़ बकाया 
 ब्राजील के बाद भारत चीनी का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यह अनुमान जताया जा रहा है की, भारत  इस वर्ष 30 मिलियन टन चीनी का उत्पादन करेगा। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दाम घटने से चीनी मिलें, गन्ना उत्पादक दोनों को कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता हैं।  कृषि मूल्य आयोग -2017 के एक रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल  519 चीनी मिलों में से  464 मिलों के पास  किसानों का  15,593 करोड़ रुपये  बकाया  है।  केवल  55  चीनी मिलों ने ही किसान के सभी पैसों का भुगतान किया है ।
इसके अलावा, बकाया राशि के मामले में शीर्ष  के 30 चीनी मिलों में से हर एक के पास  प्रत्येक 100 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है । जिन मिलों  का हर दिन का औसतन क्रशिंग  10,000 टन के आसपास है, उनका ही बकाया है और जो  55 चीनी मिलें है उनका हर दिन का औसतन क्रशिंग  केवल 3,000 टन है. इन्होने कुछ भी बकाया नहीं रखा है।  यह ‘स्केल की अर्थव्यवस्था’ का सिद्धांत है और  सरकार और किसानों के लिए एक विरोधाभास प्रस्तुत करता है। विडंबना यह है कि अगर किसानों  किसी चीनी मिल के पास बकाया है तो किसानों को अपनी उपज को एक अलग मिल में बेचने की स्वतंत्रता भी नहीं होती है। कमीशन ने सिफारिश की है कि, 464 मिलों में से  जिनका रिकॉर्ड बहुत ही खराब है ऐसे 85 चीनी मिलों का विस्तृत अध्ययन  किया जाएगा।
१ किलोग्राम चीन निर्माण के लिए २००० लिटर पानी
 वैश्विक बाजार में चीनी की सप्लाई बढ़ने से  इसकी कीमतों में गिरावट आने की संभावना है, और इससे किसानों को दिक्कते उठानी पड़ सकती है । पंजाब में १९७० के दशक तक गन्ने की फसक को किसान की प्राथमिकता थी लेकिन अब  धान की खेती की तरफ  किसान का झुकाव रहा है।  एक अभ्यास के अनुसार  बिहार में १ किलोग्राम चीनी के निर्माण के लिए केवल 822 लीटर पानी की जरुरत पड़ती है, महाराष्ट्र में 2,104 लीटर, आंध्र प्रदेश में 2,234 लीटर और तमिलनाडु में 2,245 लीटर पानी एक किलोग्राम चीनी का उत्पादन करने के लिए लगता है । यानि की आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की तुलना में  बिहार को उसी मात्रा में चीनी बनाने के लिए 1,300 से 1,400 लीटर का उपभोग करते हैं। महाराष्ट् देश का , चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक  राज्य है,  राज्य में सिंचाई के पानी का 70 प्रतिशत हिस्सा है। एक किलोग्राम चीनी निर्माण के लिए पंजाब में बिहार की तुलना में तीन गुना जादा पानी चाहिए।
पंजाब में सहकरी मिलें रही फेल 
पंजाब में दशक पुराने आतंकवाद ने राज्य में गनने की खेती को भी प्रभावित किया था, पुलिस और अन्य एजेंसियां आतंकवाद से निपटने के लिए कई बार गन्ने की खेती को तहस नहस कर देती । पंजाब में कई इलाकों में  सहकारी चीनी मिलों की स्थापना की गई थी, लेकिन समय  के साथ सहकारी चीनी मिलों ने खुद को अपग्रेड नहीं किया, नतीजतन, उनमें से आधी मिलों की भारी कर्ज की वजह से नीलामी की गई और बची कुछ मिलों पर ताले पड़े  ।  लेकिन कुछ ऐसे भी लोग है जिन्होंने मिलों की नीलामी से करोडो रूपये कमाए ।
राज्य सलाहकार मूल्य (एसएपी) एक एसी व्यवस्था है जो  वोट बैंक राजनीति में फसी हुई है। चीनी मूल्य की किसी भी जुड़ाव के बिना उच्च एसएपी असहनीय और अस्थिर हैं। चीनी की कीमतों में गिरावट (2014-15 में) के कारण बकाया जमा हुआ। अकेले उत्तर प्रदेश में कुल गन्ना बकाया का 50 प्रतिशत हिस्सा है। कमीशन ने सिफारिश की है कि एसएपी को तोड़ दिया जाए। । हाल ही में, दोबा किसान संघ समिति ने जलंधर में कहा कि जल्द ही किसानों की बकाया राशि वसूलने के लिए मिलों के सामने ध्राना धारण करना शुरू कर देगा।

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