किसानों की दशा पर न्यायालय ने चिंता जाहिर की

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प्रयागराज,12 अप्रैल (UNI) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि किसानों का जीवन लगातार नए प्रयोग एवं वजूद के लिए संघर्ष में बीत रहा है।

उन्हें सूखा, बाढ़ और लागत मूल्यों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। उद्योगों की तरह अपने उत्पाद की कीमत तय करने का उन्हें अधिकार नहीं होता। बिचैलिए उनकी मेहनत की कमाई का फायदा उठाते हैं। सरकार किसानों को समानरूप से लाभ देने में नाकाम रही है। इसलिए उनकी जीविका के मूल अधिकार से जुड़ी जमीन के अधिग्रहण पर उन्हें उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

न्यायमूर्ति एस.पी. केशरवानी ने किसानों के लिए केंद्र सरकार की ‘आयुष्मान भारत योजना’ की तारीफ करते हुए कहा है कि सरकार ने निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं देकर संविधान निर्माता डा. भीमराव अंबेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। किसान अभी भी दशकों पहले की स्थिति में है। किसानी से आय से परिवार की न्यूनतम जरूरतें पूरा करने की स्थिति नहीं बन सकी है। कई मामले प्रकाश में आये हैं, जब देश के विभिन्न हिस्सों में किसान दिक्कतों से परेशान होकर अपने जीवन को ही समाप्त कर लिया है।

न्यायालय ने नोएडा अथारिटी को किसानों को 355 रूपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजे का भुगतान तीन माह में करने का निर्देश दिया है। किसानों की जमीन विकास के लिए जबरन ले ली जाती है और उन्हें उचित मुआवजे के लिए सालों मुकदमेबाजी में उलझना पड़ता है। करीब 28 साल पहले अधिगृहीत जमीन के मुआवजे के लिए किसानों को 16 साल न्यायालय के चक्कर लगाने पड़े।

न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे को लेकर दाखिल सैकड़ों किसानों की अपीलें मंजूर कर ली है और प्रत्येक को बतौर हर्जाना पांच हजार रूपये दिए जाने का निर्देश दिया है। वर्ष 1989 से 1992 तक गौतमबुद्धनगर के चार गावाें छलेरा, आगाहपुर, मोरना एवं कोशियारपुर की जमीनें अधिगृहीत की गयी।

मुआवजे के भुगतान राशि में अंतर को लेकर मोरना गांव के रामपाल एवं सैकड़ाें किसानों ने अपर जिला जज गाजियाबाद के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। न्यायालय ने आसपास के गांवों की भूमि दर के आधार पर मुआवजा देने का आदेश दिया है।

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