“सरकार की हर संभव कोशिश है कि चीनी मिलों को सस्ती दर पर आसान शर्तों के साथ ऋण मिले”

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नई दिल्ली, 1 नवंबर: सरकार देश में गन्ना किसानों के साथ चीनी उद्योग को प्रोत्साहन देकर वित्तीय रूप से मजबूती प्रदान करने का प्रयास कर रही है। इसी कडी में चीनी मिलों को गन्ने के बाई प्रोडक्ट्स का पूर्ण रूप से उपयोग कर बायो गैस, कंपोष्ट खाद और इथेनॉल बनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। सरकार की इस तरह की पहल से चीनी मिले भी उत्साहित है। चीनी मिलों ने इथेनॉल बनाने में रूचि ली है। लेकिन वित्तीय कमी और आर्थिक तंगी के कारण कई चीनी मिलें चाहकर भी इथेनॉल प्लांट नहीं लगा पा रही ही थी। चीनी मिलों की इस समस्या को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने चीनी मिलों को आर्थिक मदद देने के लिए सस्ती दर पर ऋण आंवटित करने की पहल की है। इसके लिए सरकार द्वारा करीबन 15 हजार करोड़ रूपयों के सॉफ़्ट लोन स्वीकृति दी गयी है। सरकार के इस कदम से देशभर में कई चीनी मिलें इथेनॉल प्लांट लगाने के लिए आगे आयी है। जो चीनी मिलें घाटे में चल रही थी उन मिलों के लिए ये योजना अतिरिक्त आय अर्जित करने के बडे माध्यम के तौर पर देखी जा रही है। लेकिन सरकार ने जिस उम्मीद के साथ इस योजना के क्रियान्वयन की आशा व्यक्त की थी उस दर से कार्य प्रगति पर नहीं दिख रहा। मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार सरकार ने 15 हज़ार करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि इस मद में इसलिए रखी थी कि वित्तीय कमी के चलते चीनी मिलों को इन्तज़ार न करना पड़े। लेकिन चीनी मिलों ने शुरु में तो इस काम में तेज़ी के साथ रूचि ली लेकिन बाद में कार्य की रफ़्तार में कमी देखने को मिली ।

इस मसले पर जब मीडिया ने यूपी स्थित लमिया चीनी मिल के उप महाप्रबंधक पीए नायर से बात की तो उनका कहना था कि बेशक सरकार का ये कदम सराहनीय है लेकिन इसके लिए बैंको को भी उसी तरह से सहयोग करना चाहिए। कई चीनी मिलो को बैंको में काफी परेशानियों का सामना करना पड रहा है। कागजी कारवाई इतनी ज्यादा है लोन लेने के लिए हर दिन एक व्यक्ति बैंक के कार्यालय में ही बैठा रहता है। नायर ने कहा कि कई चीनी मिलें ऐसी हैं जिनका नाम खाद्य मंत्रालय की तरफ़ से बैंकों को लोन के लिये भेजा गया है। लेकिन इसके बावजूद कमियाँ निकाल कर काम को लटकाया जा रहा है। पहले ही इस काम में काफ़ी देरी हो चुकी है। 2018 से ये प्रक्रिया चल रही है। पहले मंत्रालय ने प्रक्रिया अपनाते अपनाते सालभर लगा दिया। अब बैंकों में मामला अटक रहा है। एक साल पूरा हो गया है। अब अगर लोन मिल गया तो फिर डेढ़ से दो साल प्लांट लगाने में पूरा हो जाएँगे तो काम शुरु कब होगा। इस लेट लतीफ़ी से चीनी मिल और गन्ना किसान दोनों को नुक़सान हो रहा है।

बैंकों की तरफ से हो रही लेटलतीफ़ी के मसले पर यूनियन बैंक के महाप्रंबधक आरसी लोढा ने कहा कि हर काम की गाइडलाइन होती है सभी फॉरमल्टीज पूरी होते ही पात्र आवेदक कम्पनी को लोन मिल जाएगा। बैंकों का सिस्टम होता है हर काम प्रक्रियानुसार नियम के तहत ही होता है।

चीनी मिलों को मिल रहे है सोफ्ट लॉन और कार्य प्रगति पर बात करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक डॉ. आर के सिंह ने कहा कि सरकार की हर संभव कोशिश है कि चीनी मिलों को सस्ती दर पर आसान शर्तों के साथ ऋण मिले लेकिन इसमें बैकों की भूमिका पर संदेह करने के बजाय तकनीक बात को समझना चाहिए। सिंह ने कहा कि ऋण देने से पहले बैंक भी अपनी तरफ से वैरिफिकेशन करते है इसमें समय लग जाता है। सिंह ने कहा कि खाद्य मंत्रालय में चीनी मिलों की ओर से लोन के लिए मिले आवेदनों में से अधिकांश को लोन के लिए योग्य पाया गया है और उन्हें लोन मिलना ही है।
ग़ौरतलब है कि हर साल चीनी मिलों पर किसानों का गन्ना का बकाया का मसला चर्चा में रहता है और बाद में चीनी मिलें वित्तीय कमी का हवाला देकर बचने की कोशिश करती रहती है। इसी समस्या का समाधान निकालने के लिए सरकार ने साल 2018 में चीनी मिलों को इथेनॉल संयंत्र लगाने के लिए सोफ्ट लोन देने की पहल शुरू की थी जिसमें मंत्रालय स्तर पर कई दौर की बैठकों के बाद चीनी मिलों के लिए सस्ती दर के दो ऋण पैकेज की घोषणा हुई थी। उम्मीद की जाती है कि सरकार की इस सोफ्ट लोन की पहल से आने वाले दिनों में चीनी मिलें गन्ने से इथेनॉल बनाकर न केवल वित्तीय रूप से और सुदृढ़ और मज़बूत बनेगी बल्कि गन्ना किसानों का समय पर बकाया चुकाने में मदद भी मिलेगी।

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