पर्यावरणीय क्लीयरेंस में अटकी है चीनी मिलों के सॉफ्ट लोन की फ़ाइलें

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नई दिल्ली, 10 नवम्बर: केन्द्र सरकार द्वारा हाल ही में गन्ने के शीरे से इथेनॉल निर्माण के लिए पर्यावरणीय बाध्यता से छूट देने के लिए की घोषणा के बाद अब चीनी मिलों ने इथेनॉल संयत्र लगाने के लिए खाद्य मंत्रालय द्वारा मंजूर किए गए सॉफ्ट लोन के लिए चीनी मिलों को पर्यावरणीय मंजूरी की बाध्यता में शिथिलता देने का अनुरोध किया है।

चीनी मिलों को अग्रणी संगठन इस्मा के महानिदेशक अबिनाश वर्मा ने कहा कि सरकार ने शीरे से इथेनॉल निर्माण के लिए पर्यावरणीय मंजूरी देकर वित्तीय संकट से जूझ रही चीनी मिलों को आर्थिक सहारा देने का महत्वपूर्ण काम किया है। वर्मा ने कहा कि जिस तरह से सरकार ने माना है कि शीरा से पर्यावरणीय नुकसान नहीं होता है उसी तरह से पहले से चल रही चीनी मिलों में अगर इथेनॉल प्लांट लगाया जा रहा है तो वहां भी चीनी मिलें पर्यावरणीय हितों का पूरा ध्यान रख रही है। वर्मा ने कहा कि सरकार ने चिन्हित कर के कुछ चीनी मिलों को सॉफ़्ट स्वीकृति दी है ताकि वो इथेनॉल संयंत्र लगा सके। लेकिन सरकार की मंशा के अनुरूप अभी तक चीनी मिलों को लोन की स्वीकृति नहीं मिली हैा। 15 हजार करोड के सॉफ्ट लोन में मात्र 8 हजार करोड रूपये का ऋण अभी तक स्वीकृत हुआ है। लोन की धीमी गति का सबसे बडा कारण चीनी मिलों को पर्यावरणीय स्वीकृति में मिलने वाली देरी है। वर्मा ने कहा कि जब सरकार ने लोन स्वीकृत किया है और चीनी संयत्र पहले चल रहे है और पूरी तरह से पर्यावरणीय हितों का ध्यान में रखकर ही काम हो रहा है। ऐसे में फिर पर्यावरणीय क्लीयरेंस के नाम पर फाइल रोककर काम को डिले करना न तो इंडस्ट्री के हित में है और न ही देश हित में।

वर्मा ने कहा कि पहले इस काम में देरी हो गयी है। मंत्रालय के स्तर पर चीनी मिलों के चयन में काफी समय लग गया। अब काम तेजी से होना चाहिए। सरकार ने जिन चीनी मिलों को ऋण लेने के लिए अधिकृत किया है उनको तो कम से कम समय पर लोन मिल जाना चाहिए। आज चीनी मिलें सरकार की मंजूरी का लेटर लेकर कभी बैंको के दरवाजे पर द्सतक दे रही है तो कभी पर्यावरणीय क्लीयरेंस के लिए उनके दफ्तरों में चक्कर लगा रही है। जितनी पेचीदगी भरे ये कानूनी मसले है उतनी ही देरी हो रही है। हमारी माँग है कि सरकार बैंकों और पर्यावरणीय क्लीयरेंस प्राधिकरण को स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करे ताकि समय पर काम हो।

इस मसले पर बात करते हुए डीसीएम श्रीराम के सलाहकार राजेश धींगरा ने कहा कि सरकार के स्तर से पहले ही काफी देरी हो चुकी है। डेढ़ से दो साल के करीब इथेनॉल प्लांट लगाने में लग जाएंगे। उसके बाद संयत्र चालू होते होते छह महिने ओर लग जाते है, तो फिर काम कब होगा। धींगरा ने कहा कि मंत्रालय में समक्ष अधिकारियों को चीनी मिलों के प्रतिनिधिमंड़ल ने सारी स्थिति से अवगत करा दिया है। जब चीनी मिले पहले से पर्यावरणीय नियमों का पूरी तरह से पालन कर रही है तो फिर से नए सिरे से कानूनी पचडे में उलझाने का क्या मतलब है। सरकार ने जिन चीनी मिलों को सॉफ्ट लोन के लिए चुना है तो जाहिर सी बात ही वो चीनी मिलें सरकारी पैरा मीटर्स का पूरा पालन कर रही है। अब फिर पर्यवारणीय क्लीयरेंस देने के नाम पर फाइल रोकना समझ से परे है।

इस मसले पर पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी से बात की गयी तो नाम नहीं छापने की शर्त पर उन्होने कहा कि उम्मीद के साथ सरकार ने इस योजना को मंज़ूरी दी थी उस तुलना में यहां काम नहीं हो रहा है। उच्च अधिकारियों को चाहिए कि जिन चीनी मिलों को सॉफ्ट लोन के लिए चुना गया है। उनसे सिम्पली शपथ पत्र ले किन हम पर्यावरणीय नियमों का पूरा पालन करेंगे। उसके बाद जब इथेनॉल प्लांट कार्य स्थिति में आ जाए तब एक डिक्लेरेशन और ले सकते है। ताकि काम भी जल्द हो और चीनी मिलों पर पर्यावरणीय नियमों की बाध्यता भी बनी रहे। एक अन्य अधिकारी ने कहा कि अलग मामलों की लम्बित पड़ी फाइलों के ढेर के बीच बाबुओं के ढीले रवैये ने इस काम की रफ्तार पर ब्रेक लगा रखे है। जबकि होना ये चाहिए कि सॉफ्ट लोन वाली फाइलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटनाने के निर्देश खाद्य मंत्रालय की तरफ से पहले ही पर्यावरण मंत्रालय को दिए जाने चाहिए ताकि देरी न हो।

गौरतलब है कि देश में गन्ना किसानों का हर साल चीनी मिलों पर करोड़ों रुपयों का बकाया रहता है। जिसके लिए किसान परेशान रहते है। चीनी मिलों की इस तरह की समस्याओं से छुटकारा दिलाने और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार कर उन्हे वित्तीय रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार ने उन्हे इथेनॉल प्लांट लगाने के लिए 15 हजार करो़ड के सॉफ्ट लोन की मंजूरी दी है लेकिन अभी तक मात्र 8 हजार करोड रूपये ही चीनी मिलों के लिए स्वीकृत हो सके है। अब जब पर्यावरण मंत्रालय ने गन्ने के शीरे से अतिरिक्त इथेनॉल निर्माण के लिए पर्यावरणीय मंजूरी लेने की बाध्यता को खत्म कर दिया है तो चीनी मिल उद्ममियों की मांग है कि सरकार को सॉफ्ट लॉन के लिए सरकार की तरफ से स्वीकृति प्राप्त चीनी मिलों को बिना देरी किए अविलम्ब पर्यावरणीय स्वीकृति देनी चाहिए जिससे चीनी मिलें जल्द से इथेलॉल प्लाटं लगाकर काम शुरु करे और गन्ना किसानों को भी समय पर उनका बकाया मिले।

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