अच्छा चीनी पैकेज भी समस्याओं को के सामने लग रहा है ‘फीका’

नई दिल्ली : चीनी मंडी 
चीनी मिलों को किसानों के गन्ना बकाया से निपटने के लिए जो कि 2017-18 चीनी मौसम के लिए 13,000 करोड़ रुपये है, केंद्र सरकार ने 26 सितंबर को 5,500 करोड़ रुपये के सहायता पैकेज को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य चीनी मिलों के तरलता में सुधार और जितना संभव हो सके बकाया  भुगतान में मदद करना था । लेकिन सरकार द्वारा दिया गया राहत पैकेज कितना भी क्यों ना अच्छा हो, चीनी उद्योग के सामने जो संकट खड़ा हुआ है, उसके सामने तो फीका ही लग रहा है ।
चीनी निर्यात सुविधाजनक बनाने के लिए पैकेज 
आर्थिक मामलों (सीसीईए) में कैबिनेट समिति द्वारा अनुमोदित पैकेज में 2018-19 चीनी मौसम के निर्यात को सुविधाजनक बनाने के लिए आंतरिक परिवहन, माल ढुलाई, हैंडलिंग और अन्य शुल्कों के लिए 1,375 करोड़ रुपये शामिल हैं। बंदरगाहों के करीब 100 किलोमीटर  स्थित मिलों के लिए 1000 रुपये प्रति टन, बंदरगाहों से 100 कि.मी. से अधिक और तटीय राज्यों में 2,500 रुपये प्रति टन होगी, गैर-तटीय इलाकों में स्थित मिलों के लिए 3,000 रुपये प्रति टन राज्य या वास्तविक व्यय, जो भी कम हो उतनी सब्सिडी दे दी जाएगी ।
13.88 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना क्रशिंग सब्सिडी
जो चीनी मिलें खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें 2018-19 चीनी मौसम के दौरान 13.88 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना की कच्ची सामग्री सब्सिडी भी मिलों को प्रदान की जानेवली है ।विश्लेषकों के मुताबिक, कच्चे माल की सब्सिडी का लाभ उठाने पर स्टैंडअलोन मिलों की कच्ची माल लागत में 4-5 फीसदी कम होने की उम्मीद है। लेकिन चूंकि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतें  उत्पादन  लागत से भी नीचे रहने का अनुमान हैं, इसलिए स्टैंडअलोन भी मिलों को घाटे से नही बचा सकता है ।
चीनी मिलों को निर्यात मासिक सूची स्तर बनाए रखना होगा 
हाल ही में क्रिसिल रिपोर्ट के मुताबिक, 26 सितंबर की नीति में कम से कम दो प्रमुख प्रावधान हैं,  जिनसे महत्वपूर्ण प्रभाव होने की उम्मीद है। ये गन्ना क्रशिंग के लिए 13.88 रुपये प्रति क्विंटल  सब्सिडी प्रदान कर रहे हैं, जिससे चीनी उत्पादन लागत में 4-5 फीसदी की कमी आएगी, और 1000-3000 रुपये प्रति टन की परिवहन लागत सब्सिडी कम हो जाएगी, जो निर्यात  परिवहन खर्च को  50-60 फीसदी तक कम कर देगी  । लेकिन यह केवल तभी मुमकिन  होगा, जब मिलों को न्यूनतम संकेतक निर्यात कोटा के तहत निर्देशित चीनी  निर्यात करते हैं। चीनी उद्योग के लिए लक्षित निर्यात, 5 लाख मेट्रिक टन है, जो  2018-19 चीनी मौसम उत्पादन के 15 प्रतिशत हैं। चीनी मिलों  को केंद्र द्वारा निर्देशित मासिक सूची स्तर बनाए रखने की आवश्यकता है।
‘क्रिसिल’ को चीनी निर्यात लक्ष्य से कम होने की उम्मीद  
निर्यात मोर्चे पर, क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि, चीनी  उद्योग अपने 5 लाख मेट्रिक टन निर्यात कोटा को पूरा नहीं कर सकता है और जादा से जादा केवल 3 लाख मेट्रिक टन निर्यात हो सकता है। थाईलैंड और यूरोपीय संघ से अनुमानित बम्पर उत्पादन के कारण अंतरराष्ट्रीय चीनी की कीमत अगले सीजन में भी कमजोर रहने की उम्मीद है।
चीनी सब्सिडी पर ऑस्ट्रेलिया भी उठा रहा सवाल 
इस बीच, ऑस्ट्रेलिया के एक प्रमुख चीनी निर्यातक ने भारत की चीनी सब्सिडी  पर अन्य देशों के लिए  चिंता जताते हुए   सवाल उठाया है कि, कैसे भारत द्वारा इस साल चीनी उद्योग को घोषित वित्तीय सहायता  विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के भीतर है।  ऑस्ट्रेलिया ने 3 लाख मेट्रिक टन चीनी बफर स्टॉक को निर्यात करने के भारत के इरादों पर भी कई प्रश्न उठाए हैं।
केंद्र सरकार कर रहा हर मुमकिन कोशिश 
महत्वपूर्ण बात यह है कि,  पिछले एक साल या उससे अधिक समय में, केंद्र सरकारद्वारा चीनी उद्योग को संकट से बाहर निकलने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जैसेकी  आयात शुल्क दोगुनी करना, निर्यात शुल्क हटा देना  और दो वित्तीय पैकेजों  के माध्यम से बफर स्टॉक के निर्माण और सॉफ्ट लोन की पेशकश । इन सभी फैसलों का उद्देश्य गन्ना किसानों का करोड़ो रुपयों का बकाया भुगतान और मिलों की आर्थिक हालात में सुधार करना था ।

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