चीनी उद्योग को “आत्मानिर्भर” बनाने के लिए दीर्घकालिक समाधान की जरूरत

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चीनी उद्योग पर्याप्त राजस्व प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता रहता है। कई चीनी मिलें मुख्य रूप से अत्याधिक गन्ना मूल्य और अधिशेष चीनी की समस्या के कारण वित्तीय तनाव में हैं। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) की 86 वीं वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुए अध्यक्ष विवेक पिट्टी, ने भारतीय चीनी उद्योग के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार साझा किए।

गन्ना मूल्य निर्धारण नीति…

उन्होंने कहा की, चीनी उद्योग को जो मूल समस्या का सामना करना पड़ रहा है, वह है गन्ना मूल्य नीति जो की दूसरे देशों में अलग है। समस्या तब सामने आती है, जब भारत को ब्राजील, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, रूस आदि जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राष्ट्रों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है जहा गन्ने का मूल्य निर्धारित करने के लिए राजस्व आय का फार्मूला है। भारत का गन्ना मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किया जा रहा है, जो राजस्व प्राप्ति से संबंधित नहीं है, जिसके कारण भारत उच्च लागत वाला चीनी उत्पादक देश है।

इथेनॉल उत्पादन और पेट्रोल के साथ सम्मिश्रण….

पिछले 2 वर्षों में, हमने देश भर में औसतन 5% इथेनॉल मिश्रित किया है। कुछ राज्यों में, हमने 9.5% तक पेट्रोल के साथ इथेनॉल मिश्रित किया है। अधिक इथेनॉल उत्पादन क्षमता विकसित करने के लिए चीनी उद्योग बेहद उत्सुक है, लेकिन बैंकों द्वारा ऋण की मंजूरी में देरी के कारण निवेश धीमा है। बैंक अभी भी इथेनॉल परियोजनाओं को वह प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं, जिनकी वे पात्रता रखते हैं, विशेषकर तब जब माननीय प्रधान मंत्री सहित सरकार, इस कार्यक्रम को इतना महत्व देती है। ऋण में देरी के अलावा, पर्यावरण मंजूरी देने में भी देरी होती है। प्रक्रिया को तेज करने के लिए, ISMA ने कई सुझाव भी दिए हैं कि वर्तमान औसत अवधि को 16 महीने से घटाकर 8 महीने कैसे किया जाए।

उप-उत्पादों और उसके बाद से राजस्व की प्राप्ति…

चीनी उद्योग सबसे अनोखा उद्योग होगा जहां गन्ने से निकलने वाली हर चीज का उपयोग न केवल चीनी बनाने के लिए किया जाता है, बल्कि बिजली, शराब, इथेनॉल, जैव-उर्वरक, बायोगैस, जैव सीबीजी आदि उत्पाद भी निर्माण किये जाते है। चीनी सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद है और कुल राजस्व के 75-80% योगदान देता है। गन्ने के रस की अधिक मात्रा के साथ अब इथेनॉल में बदल दिया जा रहा है, चीनी से 75 से 80% योगदान थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन हमें अभी भी याद रखना होगा कि चीनी हमेशा सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद बनी रहेगी।

लंबित नीतिगत निर्णय से चीनी उद्योग को समस्या…

सबसे महत्वपूर्ण लंबित मामला चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) के संबंध में है, जिसे केवल एक बार संशोधित किया गया है। फरवरी 2019 में इसे 31 प्रति किलो किया गया, तब से 22 महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन एमएसपी को संशोधित नहीं किया गया है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि सरकार ने अक्टूबर 2020 से गन्ने के लिए एफआरपी में वृद्धि की है। अप्रैल 2020 की अपनी रिपोर्ट में निति आयोग ने MSP 33 रूपये प्रति किलो करने का सुझाव दिया था।

अधिशेष चीनी से निपटने और चीनी उद्योग को वास्तव में “आत्मानिर्भर” बनाने के लिए दीर्घकालिक उपाय, किसानों को सही मूल्य संकेत देकर, गन्ने पर नीतियों को युक्तिसंगत बनाना है।

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