राष्ट्रीय शर्करा संस्थान को ‘गन्ना की खोई से गैर-आयनिक सर्फैक्टेंट’ विकसित करने के लिए मिला पेटेंट

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राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर को “गन्ना की खोई से गैर-आयनिक सर्फैक्टेंट” विकसित करने के लिए एक और पेटेंट मिला है। इस प्रकार के सर्फैक्टेंट में बहुत अच्छी सतह गतिविधि और उत्कृष्ट बायो-डेगराडाबिलिटी के गुण होते हैं और इसका प्रयोग साबुन और डिटर्जेंट के उत्पादन सहित व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों एवं सौंदर्य प्रसाधनों में होता है। उत्पाद को सुश्री अनुष्का कनोडिआ, सीनियर रिसर्च फेलो द्वारा डॉ विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव, कार्बनिक रसायन विज्ञान के सहायक प्रोफेसर के मार्गदर्शन में विकसित किया गया है।

गन्ने की खोई में सेल्युलोज, हेमिकेलुलोज और लिग्निन घटक होते हैं। मूल्य वर्धित उत्पाद, जिसे रासायनिक रूप से ओ-अल्काइल पॉली पेंटोसाइड के रूप में जाना जाता है, खोई के हेमिकेलुलोज अंश से प्राप्त किया गया है, श्री नरेंद्र मोहन, निदेशक ने कहा। इस प्रकार, खोई के सेल्युलोज और लिग्निन भाग अन्य उपयोगों के लिए उपलब्ध रहेंगे। ओ-अल्काइल पॉली पेंटोसाइड का उपयोग डिटर्जेंट में फोम के गठन को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग व्यक्तिगत देखभाल के उत्पाद बनाने वाले उद्योग में भी किया जाता है क्योंकि यह बायोडिग्रेडेबल है और संवेदनशील त्वचा के लिए सुरक्षित है।

डॉ. विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव ने कहा, हमने फैटी एसिड का उपयोग करके गन्ने की खोई के ग्लाइकोसिलेशन की प्रक्रिया की, फिर सेल्युलोज और लिग्निन को छान कर हटाने के बाद प्राप्त विलयन मे सोडियम हाइड्रॉक्साइड मिलाया और फिर नियंत्रित परिस्थितियों में आसवन द्वारा जैव-उत्पाद प्राप्त किया है, डॉ विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव ने कहा। उन्होंने कहा कि कई प्रयोगों के बाद उत्पाद को प्राप्त करने में हमें तीन साल से अधिक का समय लगा।

बाजार में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध ऐसे उत्पादों की कीमतों (रु 160-200 प्रति किग्रा.) की तुलना में इस उत्पाद की कीमत लगभग एक-तिहाई होने की उम्मीद है। सुश्री अनुष्का कनोडिआ ने कहा कि गन्ने की खोई से उत्पाद की प्राप्ति 12-15% रही है, जिसमें और सुधार हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन लागत में और कमी आएगी।

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