राष्ट्रीय शर्करा संस्थान ने ‘गन्ना आधारित चीनी कारखानों मे डिफ़्यूसर” विषय पर वेबिनार आयोजन किया

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राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर मे “गन्ना आधारित चीनी कारखानों मे डिफ़्यूसर” विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। जिसमे भारत, केन्या, इन्डोनेशिया और नाइजीरिया के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर के निदेशक श्री नरेंद्र मोहन ने अपने प्रस्तुतिकरण मे गन्ना आधारित चीनी कारखानों मे डिफ़्यूसन तकनीक पर आधारित आधुनिक डिफ़्यूसर के उपयोग के बारे में बताया। उन्होने अपने प्रस्तुतिकरण मे पारंपरिक मिल विधि जहाँ गन्ने को पेर कर रस निकला जाता है उस के स्थान पर डिफ़्यूसर के उपयोग से लाभ को रेखांकित किया। उन्होने कहा आज मात्र 2% भारतीय चीनी कारखानों मे इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर के निदेशक ने यह भी बताया कि पूर्व मे अपना देश डिफ़्यूसर के मामले मे विदेशी आयात पर निर्भर था जबकि आज हमारे देश की चीनी कारखानों के अनुकूल स्वदेशी डिफ़्यूसर के विकास से हम “आत्मनिर्भर” हो चुके हैं। पारंपरिक मिल तकनीक के स्थान पर डिफ़्यूसर के इस्तेमाल से चीनी की प्राप्यता दर बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा की खपत भी कम हो जाती है। इसके साथ ही कम पूंजी लागत के साथ अन्य लागत तथा रख रखाव इत्यादि भी कम हो जाते हैं। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर के निदेशक ने इस संदर्भ मे यह भी बताया कि इन्हे फैक्ट्री बिल्डिंग के बाहर भी स्थापित किया जा सकता है फलतः सिविल लागत भी इस पर कम आती है। इसके कुल लाभों के आकलन से यह ज्ञात होता है कि 5000 TCD के क्षमता वाले चीनी कारखाने मे प्रति वर्ष 750 से 800 लाख की अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है।

कार्यक्रम मे मे मित्र फ़ोल शुगर कंपनी, थाईलैंड के एक्सपर्ट डॉ. जॉर्ज एडवर्ड राउल लियोनेट ने अफ्रीकी और यूरोप के देशो मे क्रमशः गन्ना एवं चुकंदर के लिए प्रयुक्त डिफ़्यूसर के भिन्नताओं के बारे मे विस्तार से बताया। उन्होने इस संदर्भ मे डिफ़्यूसर के संचालन मे ऑटोमेशन (स्वतः प्रक्रिया संचालन)की आवश्यकता के बारे भी बताया। विल्मार इंटरनेशनल, ऑस्ट्रेलिया के श्री लुक ब्रॉउकार्ट ने ऑस्ट्रेलिया, रीयूनियन आइलैंड, साउथ अफ्रीका एवं गुयाना के कार्यरत डिफ्यूजर की कार्य प्रणाली के बारे मे अपने अनुभव साझा किये। ये एक स्थापित तकनीक है एवं पारम्परिक मिलिंग तकनीक की अपेक्षा कम लागत की तकनीक है जिससे गन्ने से अधिक चीनी प्राप्त होने के कारण, चीनी मिले कहीं अधिक लाभ प्राप्त कर सकती हैं।

ISGEC, नोयडा के व्यावसायिक प्रमुख श्री संजय अवस्थी ने इस अवसर पर ISGEC द्वारा विकसित डिफ़्यूसर के बारे मे बताया और कहा कि उनका लक्ष्य इसके माध्यम से गन्ने के रस का 50% उपयोग चीनी प्रसंस्करण मे और बाकी 50% का उपयोग ईथनोल उत्पादन मे करने योग्य बनाना है। SS इंजीनियर्स, पुणे के शर्करा तकनीक प्रमुख श्री जे पी शुक्ल ने उनके विकसित डिफ़्यूसर की संरचनात्मक कार्यप्रणाली के बारे बताया। इस प्रकार विकसित सात डिफ़्यूसरो की कार्यविधि के परिणामों से यह आशा की जा सकती है कि इससे निम्न ऊर्जा खपत के साथ ही 5% अधिक चीनी की प्राप्यता सुनिश्चित हो सकेगी। उन्होने यह भी कहा कि इस प्रकार अतिरिक्त उत्पादित ऊर्जा को ये चीनी कारखाने निर्यात कर अतिरिक्त आय भी प्राप्त कर सकेंगे।

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