गन्ना उत्पादक देशों के बीच एक संयुक्त तंत्र बनाने की जरूरत

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नई दिल्ली, 8 फरवरी: वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार गन्ने की खेती में तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने के साथ वैज्ञानिक नव प्रयोगों को अपनाने पर जोर दे रही है। राजधानी दिल्ली में मीडिया ये बात करते हुए बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशिया के महानिदेशक डॉ. एच पी गुप्ता ने कहा कि आज जलवायु परिवर्तन की चुनौती जितनी गंभीर है उतनी ही बडी समस्या गन्ने की उन्नत खेती कर उत्पादन बढ़ाने की भी है। डॉ गुप्ता ने कहा कि जल संकट जितना बढ़ता जा रहा है उतनी है गन्ने की खेती प्रभावित होती जा रही है। मौसमी परिस्थितियों की ऐसी चुनौतियाँ से निपटने के लिए कम जल में ज्यादा उत्पादन लेने वाली फसलों को आज उगाने की जरूरत है वहीं दुनियाभर के वैज्ञानिकों के बीच संवाद स्थापित कर मौसम से जुड़ी जानकारियों के पूर्वानुमान का साझा मैकेनिज्म बनाये जाने की भी जरूरत है ताकि बाढ़, सूखा और जोखिम की स्थितियों से निपटने की रणनीति पर काम किया जा सके।

गन्ने की खेती को मौसम की चुनौतियों से सहनशील बनाने और मौसम के पूर्वानुमान लगाने के विषय पर भारत मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ केजे रमेश ने कहा कि गन्ना उत्पादक देशों के बीच एक संयुक्त तंत्र बनाने की जरूरत है। ताकि सदस्य देश जलवायु से जुड़ी विपरीत परिस्थियों से निपट सके। डॉ. रमेश ने कहा कि दुनिया का 70 फीसदी गन्ना उष्ण और उपोष्ण जलवायु क्षेत्रों में पैदा होता है और बाकी 30 फीसदी टेम्परेट जोन में होता है। ऐसे में इन जलवायु क्षेत्रों में वैज्ञानिकों के बीच संयुक्त तंत्र विकसित कर गन्ने की खेती को प्रौत्साहन दिया जा सकता है।

बिम्सटेक देशों को सचिवालय में सिंचाई प्रबंधन विभाग के निदेशक डॉ. टून सावे ने कहा कि गन्ना उत्पादक देशों में ब्राजील, भारत, यूरोपियन यूनियन, थाइलैंड और चीन जैसे पांच देश दुनियां के गन्ना और चीनी बाजार पर अपनी पकड़ रखते है ऐसे में इन देशों के बीच समन्वय बनाकर गन्ने की खेती के साथ उत्पादन के आंकडे को बढाया जा सकता है।

गन्ने की खेती में पानी की चुनौतियों से निपटने के मसले पर बात करते हुए हरियाणा स्थित भारत सरकार के गन्ना प्रजनन संस्थान,करनाल के निदेशक डॉ नीरज कुलश्रेष्ठ ने कहा कि गन्ने की खेती से जुड़े हर राज्य में हमारे शोध संस्थान कार्य कर रहे है जो किसानों को ड्रिप, स्प्रिंकलर और अन्य तकनीकों की जानकारी दे रहे है। इसके अलावा अलग जलवायु क्षेत्रों के अनुसार विपरीत परिस्थितियों के प्रति सहनशील किस्में निकाली गयी जा रही है जिनको उगाकर किसान कम पानी में गन्ने की अच्छी खेती कर सकते है।

गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों की वजह से वैश्विक स्तर पर गन्ने की न केवल खेती प्रभावित हो रही है चीनी का उत्पादन भी लगातार घट रहा है। ऐसे में गन्ना और चीनी उद्योग को बचाये रखने के लिए न केवल जलवायु परिवर्तन के प्रति गन्ने की सहनशील क़िस्में तैयार करनी होगी बल्कि खेती में नवाचारों के साथ वैश्विक स्तर पर मौसम से जुडी जानकारियों के लिए संयुक्त तंत्र भी विकसित करना होगा।

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