चीनी उद्योग को उबारने की जरूरत

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बीते दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा चीनी उद्योग को दी जाने वाली सहायता राशि की घोषणा से मिल मालिकों को राहत सी महसूस हुई है। इसमें किसानों को साढ़े पांच रुपये प्रति क्विंटल की दर से सब्सिडी भुगतान किए जाने का निर्णय लिया गया है। इस फैसले के अनुसार किसानों द्वारा मिलों में बेचे गए गन्ने की मात्रा के आधार पर यह सब्सिडी मिल मालिकों की तरफ से किसानों तक जाएगी। हालांकि सरकार ने यह फैसला गन्ना उत्पादकों का फसल वर्ष 2017-2018 के दौरान मिलों पर बकाया कम करने के प्रयास में लिया गया है, लेकिन अंतत: इससे मिल मालिकों का ही फायदा होगा। सच है कि चीनी मिलों पर किसानों का 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है जिसके भुगतान में प्रत्येक वर्ष की तरह हीलाहवाली की जा रही है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार गन्ना खरीद के बाद मिलों द्वारा किसानों को भुगतान किए जाने वाले उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी के तहत दी जाने वाली कीमत से साढ़े पांच रुपये प्रति क्विंटल की सहायता सीधे तौर पर किसानों के खाते में जाएगी जिससे मिलों का बोझ कम हो सकेगा। इस फैसले से मिलों को लगभग 1,540 करोड़ रुपये की सब्सिडी मिलेगी और किसानों को साढ़े पांच रुपये प्रति क्विंटल का सीधा भुगतान हासिल होगा।

नि:संदेह सरकार का यह कदम सराहनीय है, लेकिन समयबद्ध भुगतान के अभाव में किसानों का भला नहीं हो पा रहा है। किसी भी वर्ष गन्ना उत्पादकों को वक्त पर सही कीमत नहीं मिल पाती जबकि सेंट्रल शुगरकेन ऑर्डर के अनुसार मिलों द्वारा किसानों को खरीद के 14 दिनों के भीतर कीमत भुगतान करने का आदेश है। ऐसा नहीं होने पर 15 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने का प्रावधान है। अफसोस की बात है कि ऐसे आदेश कागजों तक सीमित रहे हैं। कई बार उत्पादन में अधिकता के कारण भी किसानों को लागत मूल्य से वंचित रहना पड़ता है। पिछले तीन गन्ना वर्षों के दौरान इसका उत्पादन क्रमश: 283, 251 और 202 लाख टन था जो इस बार बंपर उपज के बाद 317 लाख टन होने का अनुमान है। सर्वाधिक बढ़त के साथ महाराष्ट्र इस वर्ष पिछले साल की तुलना में दोगुने से भी अधिक उत्पादन कर रहा है। ऐसे में केंद्र सहित राज्य सरकारों के समक्ष चुनौती है कि मिलों की रक्षा कैसे की जाए? बंपर उत्पादन का नुकसान किसानों को भी न हो, यह सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती होनी चाहिए। इस वर्ष चीनी का अनुमानित उत्पादन 3.17 करोड़ टन है जो जो पिछले सितंबर-अक्टूबर सत्र के 2.3 करोड़ टन की तुलना में लगभग 56 फीसदी अधिक है। इसका असर चीनी की घरेलू कीमतों में इतना पड़ा कि इसका थोक भाव 26 रुपये प्रति किलोग्राम के साथ तीन वर्षों के निचले स्तर पर आ गया।

भारत में इस वर्ष औसतन 2.5 करोड़ टन चीनी उपभोग तथा 20 लाख टन के निर्यात का लक्ष्य है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी तीव्र गिरावट से अपेक्षित निर्यात भी संशय के घेरे में है। विश्व का तीसरा बड़ा चीनी निर्यातक होने के बावजूद इस बार निर्यात का विकल्प आसान नहीं है। सरकार द्वारा मार्च में चीनी निर्यात ‘कर’ में 20 फीसदी की रियायत शायद इसी की तैयारी थी। मिलों द्वारा समय-समय पर सरकार से यह गुहार भी लगाई जाती रही है कि किसानों को गन्ने की कीमत का भुगतान करने हेतु उन्हें दो किस्तों का विकल्प और कॉपरेटिव सोसाइटी को दिए जाने वाले कमीशन को दो रुपये प्रति क्विंटल कर दिया जाए जो वर्तमान में 7.65 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से दिया जाता है। मौजूदा हालात में मिल मालिक चीनी की बहुतायन और कीमत में गिरावट को लेकर चिंतित हैं। उनका तर्क है कि रंगराजन फॉर्मूले के तहत 10.8 फीसदी की रिकवरी रेट पर किसानों को किए जाने वाले भुगतान से उन्हें प्रति क्विंटल 62 रुपये का नुकसान होगा। उद्योग की रक्षा भी सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इस दिशा में किसानों की अनदेखी कृषि उद्योग को कमजोर करती आ रही है।

गन्ना किसानों की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है। प्रमुख उत्पादक राज्यों में विभिन्न दलों के घोषणा पत्रों में यह अहम मुद्दा भी बनता रहा है, लेकिन सरकारों की लगातार असंवेदनशीलता के कारण ‘लेट पेमेंट’ की व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाया। वर्ष 2014-15 में एफआरपी में पांच फीसदी की मामूली बढ़त के बाद पिछले वर्ष 2017- 18 हेतु 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी। गन्ने का सबसे अधिक उत्पादन करने वाले उत्तर प्रदेश में भी इसमें तीन सालों तक कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। चुनावी वर्ष के कारण नवंबर 2016 में राज्य समर्थित मूल्य ‘एसएपी’ में 25 रुपये की वृद्धि किसानों के लिए उत्साहजनक नहीं रही। हालांकि केंद्र सरकार रंगराजन फार्मूले के अनुसार चीनी के राजस्व का 75 फीसदी हिस्सा उत्पादकों को भुगतान करने को प्रयत्नशील है, लेकिन इस प्रावधान में रिकवरी रेट के साथ जुड़ी शर्तें इन्हें परेशान करने वाली हैं। उत्तर प्रदेश में इस निर्देश से किसानों के बीच राज्य परामर्श मूल्य जो एफआरपी से अक्सर अधिक होता है, समाप्त हो जाने का खतरा है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस फार्मूले से कीमत निर्धारित हो रही है। इस बीच किसानों के लिए राहत की बात यही है कि सरकार एफआरपी सुनिश्चित कराने को लेकर प्रतिबद्ध रही है। आगामी गन्ना सत्र 2018-19 हेतु कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी सीएसीपी द्वारा एफआरपी में 20 रुपये प्रति क्विंटल की प्रस्तावित बढ़ोतरी भी राहत की आस है। यह पहली बार नहीं जब मिलों का बोझ कम करने के लिए सरकारी सहायता दी जा रही है। किसानों का बकाया चुकाने के नाम पर कई बार आयात कर में इजाफा व मिलों को सब्सिडी मिलती रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले संप्रग सरकार द्वारा चीनी मिलों का 6600 करोड़ का ब्याज मुक्त कर्ज, शुगर डेवलपमेंट फंड से महाराष्ट्र की 19 चीनी मिलों को केंद्र सरकार द्वारा 140 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता, पेट्रोल में 5 फीसदी एथनॉल मिश्रण की अनिवार्यता, एथनॉल के दाम में बढ़ोतरी आदि सहयोगों के जरिये मिलों को मदद मुहैया कराई गई, लेकिन गन्ना उत्पादकों की लॉबी न होने से वे मजबूर रहे। बीते कुछ वर्षों में किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं रही है। उनके आक्रोश को शांत करने के लिए कुछ हद तक कर्ज माफी भी हुई, लेकिन वन नाकाफी होने के साथ ही अस्थाई राहत है। इस साल बजट में किसानों को एमएसपी के अतिरिक्त 50 फीसदी का लाभकारी मूल्य देने की घोषणा हुई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इसे कैसे मूर्त रूप दिया जाए? वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना सरकार के मुख्य एजेंडे में जरूर है, लेकिन अब इस दिशा में तेजी से कदम उठाने की दरकार है।

SOURCEJagran

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