अब कृषी उत्पन्न निर्यात निती होगी आसान

नई दिल्ली: चीनी मंडी

अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने घोषणा की थी कि कृषि आय को बढ़ावा देने के लिए जल्द ही नई कृषि निर्यात नीति को लागू किया जाएगा। इसके चलते वाणिज्य मंत्रालय ने किसी भी प्रतिबंध से मुक्‍त संसाधित और जैविक वस्तुओं के सहज सुलभ निर्यात नीति पर बडी तेजी से काम चल रहा है, इसके तहत बहुत जल्द कैबिनेट में प्रस्ताव रखा जायेगा। इससे कृषी उत्पन्‍न निर्यात निती आसान होगी।

देश की खाद्य सुरक्षा ध्यान मे रखी जाएगी

महत्वपूर्ण बात यह है कि, इस प्रस्ताव के लिए कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद, वाणिज्य मंत्रालय कृषि, खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालयों के साथ परामर्श शुरू करेगा, देश की खाद्य सुरक्षा ध्यान मे रखते हुए केवल कुछ ही कृषि वस्तुओं की निर्यात  को इस नई निर्यात निती से बाहर रखा जाएगा। जैसे की राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्याज, दालों, कपास और चीनी के निर्यात पर  अगर जरूरत पडी तो सिमीत दायरे में प्रतिबंध लगेगा। इन प्रतिबंधों में न्यूनतम निर्यात मूल्य, निर्यात शुल्क और एक पूर्ण प्रतिबंध ऐसे तरीके अपनाये जाते है।

भारत विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं के रूप में स्थापित

वाणिज्य मंत्रालय का विचार यह है कि,  नई कृषी निर्यात निती में प्रतिबंध केवल चावल और गेहूं जैसी बहुत कम आवश्यक वस्तुओं के मामले में लगाया जा सकता है और यह भी, असाधारण परिस्थितियों में और अंतिम उपाय के रूप में लगेगा। कृषि निर्यात नीति के पीछे यह विचार है की,  व्यापार नीति सुलभ हो जो किसानों की आय डबल हो जाऐ, ताकि हम खुद को विश्‍वभर के बाजारों में विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं के रूप में स्थापित कर सकें। वाणिज्य मंत्रालय ने मार्च में राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्याज और दालें समेत प्रमुख कृषि वस्तुओं के लिए सीमित सरकारी हस्तक्षेप के साथ एक स्थिर व्यापार नीति व्यवस्था की मांग करते हुए कृषि निर्यात नीति तैयार की थी, 2022 तक उसने देश के कृषि निर्यात को 60 अरब डॉलर से अधिक करने के उपायों का सुझाव दिया था ।

एपीएमसी अधिनियम में सुधार

एपीएमसी अधिनियम में सुधार के तहत, मंडी शुल्क की सुव्यवस्थितता और भूमि पट्टे पर मानदंडों के उदारीकरण  का सुझाव दिया गया हैं।  कृषी उत्पन्‍न के घरेलू मूल्य में उतार-चढ़ाव के आधार पर निर्यात व्यवस्था में परिवर्तन हो सकता है। प्याज, चावल, गेहूं, तिलहन, दालें और चीनी जैसी वस्तुओं के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने 2007 में गेहूं के निर्यात और 2008 में गैर-बासमती चावल पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि 2011 में चावल और गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध उठाया गया था, लेकिन ब्लैक सागर क्षेत्र में गेहूं के प्रमुख आपूर्तिकर्ता रूस और अन्य देशों की वजह से गेहूं के व्यापारी बड़े पैमाने पर सूखे के लाभ का फायदा उठाने में चुक गए । सरकार ने लगभग हर साल प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया है और कपास और चीनी निर्यात पर भी समय-समय पर प्रतिबंध लगा दिया है। प्रमुख दालों और तिलहनों पर एक निर्यात प्रतिबंध लंबे समय से प्रभावी था। हालांकि, हाल के वर्षों में, कृषि व्यापार नीति में उतार-चढ़ाव में काफी कमी आई है।

अल्पकालिक नही, दीर्घकालिक लक्ष्यों की सोच

कुछ कृषि वस्तुओं की घरेलू कीमत और उत्पादन अस्थिरता को देखते हुए, मुद्रास्फीति को कम करने के अल्पकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नीति के रूप में उपयोग करने की प्रवृत्ति रही है। किसानों को मूल्य समर्थन प्रदान करना और घरेलू उद्योग की रक्षा की जाती थी। इस तरह के फैसले घरेलू मूल्य संतुलन को बनाए रखने के तत्काल उद्देश्य  पुरा कर सकते हैं, लेकिन वे दीर्घकालिक और विश्वसनीय सप्लायर के रूप में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की छवि खराब कर देते हैं।  नई कृषी निर्यात निती में भारत को विश्‍व बाजार में विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं के रूप में स्थापित करने की कोशीश होगी।

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