महाराष्ट्र सरकार द्वारा भूजल निति मसौदा टिप्पणियों के लिए खुला : फसल उत्पाद के पारंपरिक तरीकों में आएगा बदलाव

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मुंबई : चीनी मंडी

महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के जल-तनाव वाले या अवर्षणग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई और फसल उत्पाद के पारंपरिक तरीकों में बदलाव लाने के लिए भूजल नीति तैयार की है, इस निति की तहत गन्ने जैसी जल-गहन फसलों का जल तनाव वाले इलाकों में पारंपरिक तरीकों से उत्पादन लेने से परहेज किया जायेगा । जल तनाव वाले इलाकों में किसानों को सूक्ष्म सिंचाई तरीकों का उपयोग करना होगा, जिससे उस इलाके की जल व्यवस्था पर अतिरिक्त तनाव ना पड़ सके। इन जल निति का मसौदा अब टिप्पणियों के लिए खुला रखा गया है। आगे जाकर महाराष्ट्र के इस जल निति का देश के अन्य राज्य भी अनुकरण कर सकते है।

भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,400 घन मीटर
भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1951 में 5,177 घनमीटर की तुलना में २०१८ में लगभग 1,400 घन मीटर तक कम हुई है और 2050 तक यह 1,140 घन मीटर तक गिरने का अनुमान है। इस स्थिति में, राज्य के किसानों द्वारा भूजल का सही और सटिक उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, और किसानों को फसल उत्पादन करते वक़्त वाटरशेड जल संसाधन समिति (डब्ल्यूडब्ल्यूआरसी) से अनुमति प्राप्त करनी होगी । द इंडियन एक्सप्रेस में छपे समाचार के अनुसार, जल निति मसौदे के नियमों में सभी जल-तनाव वाले क्षेत्रों के किसानों को फसल को पाणी देने के पारंपरिक तरीकों को छोड़कर सूक्ष्म सिंचाई तरीकों का उपयोग करने के लिए सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जायेगा ।

चावल और गन्ने को लगता है 60% से अधिक पानी
अशोक गुलाटी और गायत्री मोहन बताते हैं कि, भारत की सबसे बड़ी समस्या कृषि में भारी जल-अपशिष्ट है, जो भारत के कुल ताजे पानी के संसाधनों का लगभग 78% उपभोग करती है। उनका कहना हैं की, चावल और गन्ना यह दो फसलें देश में 60% से अधिक सिंचाई के पानी का उपभोग करते हैं, जो कुल फसल वाले क्षेत्र मे केवल 24% हैं। गन्ने के मामले में, वे कहते है की, बाढ़-सिंचाई से 65% पाणी खींचता है, अगर पारंपरिक बाढ़-सिंचाई की जगह ड्रिप-सिंचाई का उपयोग किया जाता है तो 35% पाणी बच जायेगा, और तो और उर्वरकों जैसे अन्य इनपुट की खपत भी कम होगी ।

महाराष्ट्र में कुल भूमि के 4% पर गन्ना
जबकि महाराष्ट्र में कुल भूमि के 4% पर गन्ना उगाई जाती है, यह राज्य में दो तिहाई पानी का उपयोग करती है; यह तब बदतर हो जाता है क्योंकि भारत के 48% की तुलना में महाराष्ट्र की भूमि का केवल 19% सिंचित है। जब कुछ साल पहले महाराष्ट्र सरकार ने पाणी की बर्बादी रोकने के लिए आईपीएल मैच का विरोध किया था, एफई ने बताया कि, सभी आईपीएल मैचों द्वारा उपयोग किए जाने वाले पानी के बराबर तीन टन चीनी उत्पादन होता था, जबकि राज्य में हर साल 8-9 मिलियन टन चीनी का उत्पादन किया जाता है ।

गुलाटी-मोहन बताते हैं की, गन्ना क्षेत्र के परंपरागत सिंचाई में एक हेक्टर के लिए जितने पानी की जरूरत होती है, उसी जगह उतनेही पानी से ड्रिप प्रौद्योगिकी के माध्यम से अतिरिक्त 2.29 हेक्टर क्षेत्र लाया जा सकता है और कपास में ड्रिप सिंचाई को अपनाया जाने पर इस क्षेत्र को दोगुना कर दिया जा सकता है; इसका मतलब है 1.95 लाख रुपये तक अतिरिक्त आउटपुट मिलता सकता हैं। साथ ही सोचने वाली बात यह भी है की, बिहार को जहां 1 किलो चीनी उत्पादन के लिए केवल 799 लीटर की जरूरत है, वही महाराष्ट्र राज्य को 2.7 गुना ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है। महाराष्ट्र ने जल निति लाकर अच्छी शुरुआत की है ।

SOURCEChiniMandi

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