चीनी उद्योग की समस्या से गहराया राजनीतिक और आर्थिक संकट

पुणे : चीनी मंडी 

देश में चीनी केवल एक वस्तु नही है बल्कि कई बार संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा भी बनी है। कुछ समय  से आर्थिक संकट से गुजर रहे चीनी उद्योग को आधार देने के लिए जून महिने में  केंद्र सरकार ने  पैकेज की घोषणा की,  लेकिन उससे पहले मई में सत्ताधारी बीजेपी को केयराना (यूपी) के उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। केयराना में बड़ी मात्रा में  गन्ने की फसल होती है और वहाँ गन्ने की दर ही चुनावी मुद्दा भी था |

7,000 करोड़ रुपये का बकाया पैकेज पर्याप्त नहीं  

चीनी उद्योग विश्लेषकों  के अनुसार, चीनी उद्योग के संकट को हल करने के लिए  केंद्र सरकार ने दिया हुआ 7,000 करोड़ रुपये का बकाया पैकेज पर्याप्त नहीं था। चीनी उद्योग के अनुसार, केवल ब्याज में सब्सिडी (मिलों की इथेनॉल उत्पादन क्षमता के विस्तार के लिए) और चीनी के बफर स्टॉक  का प्रावधान चीनी मिलों को राहत देने में सफल नही हुए।

घरेलू और वैश्विक बाजार में चीनी के अतिरिक्त उत्पादन से कीमतों में लगातार गिरावट आई है, जिससे मिलों के  आर्थिक हालत को प्रभावित किया जा रहा है,  मिलें किसानों को समय पर भुगतान नही कर सकी, उससे मिलों को बकाया राशि में भारी वृद्धि का सामना करना पड़ रहा हैं। इससे देश के किसान खुश नहीं हैं और वे इसे केंद्र  सरकार की  विफलता मानते हैं।

इन तीन राज्यों में चीनी हो सकता है चुनावी मुद्दा

अकेले यूपी में किसानों को बकाया मार्च 2019 तक 20,000 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है। नया क्रशिंग सीजन एक महीने में शुरू होने वाला है और गन्ना उत्पादकों की देनदारी बढ़ने की संभावना है। विश्लेषकों का मानना है कि, यूपी, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे  कम से कम तीन राज्यों में अगर केंद्र मिलों को बफर स्टॉक और किसानों की बकाया राशि में मदद करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप नहीं करता है तो यही गन्ने का मुद्दा चुनाव परिणामों को निर्धारित कर सकता है।

चीनी निर्यात के लिए हलचलें तेज 

हालांकि, इस निराशा के माहोल के बीच आशा की किरण नजर आ रही है। सरकार चीनी पर आयात शुल्क लगाकर  आगामी सीजन की फसल से अतिरिक्त कच्ची चीनी निर्यात करने में मदद करेगी। चीन ने भी ने चीनी भारत से चीनी आयात करने के बारे में कुछ सकारात्मक संकेत दिए हैं और भारत  1.5-2 मिलियन टन कच्चे चीनी का निर्यात करने की उम्मीद है। भारत बांग्लादेश को 2-2.5 मिलियन टन चीनी निर्यात करने की भी उम्मीद कर रहा है। इंडोनेशिया, जिसमें 3.5-4 मिलियन टन की वार्षिक कच्ची चीनी की आवश्यकता है, चाहता है कि भारत चीनी आयात पर वार्ता शुरू करने से पहले ताड़ के  तेल पर आयात शुल्क कम करे। मलेशिया ने चीनी खरीदने के लिए भी इसी तरह की स्थितियों का प्रस्ताव दिया है। मध्य पूर्व और श्रीलंका को करीब 400,000 टन चीनी  की निर्यात प्रक्रिया शुरू की है।

 

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