शुगर इंडस्ट्री की गुहार, प्राइस कंट्रोल का उपाय न करे सरकार

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इंडस्ट्री ने कहा, गन्ने की कीमत को चीनी और इसके बाय-प्रॉडक्ट की कीमतों के अनुसार तय किया जाना चाहिए और इसके लिए केंद्र की ओर से तय किए गए FRP का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए

चीनी की गिरती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए शुगर इंडस्ट्री ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह बिक्री पर दोबारा नियंत्रण लगाने का कदम न उठाए। फूड मिनिस्ट्री को दिए एक ज्ञापन में इंडस्ट्री ने कहा है कि गन्ने की कीमत को चीनी और इसके बाय-प्रॉडक्ट की कीमतों के अनुसार तय किया जाना चाहिए और इसके लिए केंद्र की ओर से तय किए गए फेयर एंड रेम्युनरेटिव प्राइस (FRP) का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।

शुगर इंडस्ट्री ने बताया है कि देश में चीनी का 3.6 करोड़ टन का बड़ा स्टॉक है। इसमें पिछले वर्ष का बचा हुआ 40 लाख टन का स्टॉक शामिल है। चीनी का केवल 10-20 लाख टन एक्सपोर्ट होने की ही संभावना है और देश में चीनी की लगभग 2.5 करोड़ टन की स्थिर खपत के मद्देनजर इंडस्ट्री के लिए स्थिति चिंताजनक है।

चीनी मिलों पर किसानों की गन्ने की 21,000-22,000 करोड़ रुपये की रकम बकाया है।

एक ग्लोबल शुगर कंपनी के एनालिस्ट ने कहा कि चीनी मिलों के लिए कैश फ्लो बढ़ाने की जरूरत है और यह केवल बिक्री के जरिए ही हो सकता है।

इंडस्ट्री अपनी समस्याओं को लेकर फूड मिनिस्ट्री के अधिकारियों के साथ मीटिंग कर रही है। इंडस्ट्री को उम्मीद है कि सरकार चीनी के लिए बफर स्टॉक बनाएगी, चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य कय करेगी और एक्सपोर्ट को बढ़ावा देगी।

एनालिस्ट ने बताया, ‘2013 में चीनी से कंट्रोल हटाने से पहले सरकार प्रत्येक चीनी मिल के लिए प्रत्येक महीने या तिमाही का बिक्री का कोटा तय करती थी। उस समय ज्यादा बिक्री नहीं थी और सरकार कीमतों को स्थिर रखना सुनिश्चित करती थी। मौजूदा समस्या चीनी के बड़े कैरी ओवर स्टॉक की है और इसका समाधान अधिक चीनी की समस्या से निपटना के जरिए हो सकता है। इसके लिए चीनी की बिक्री पर नियंत्रण करना ठीक नहीं होगा।’

एक शुगर कंपनी के एग्जिक्यूटिव ने बताया कि उन पर किसानों और बैंकों की बकाया रकम चुकाने का दबाव है और वह स्टोरेज की समस्या का भी सामना कर रहे हैं। उनका कहना था, ‘सरकार को FRP तय करना बंद करना चाहिए क्योंकि यह 2009-10 से 96 पर्सेंट बढ़ चुका है। यह अन्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक है।’

उन्होंने कहा कि चीनी मिलों की ओर से दी जाने वाली गन्ने की कीमत चीनी से रेवेन्यू के 70-75 पर्सेंट पर तय होनी चाहिए और अभी की तरह 90-100 पर्सेंट पर नहीं। उन्होंने बताया, ‘गन्ना किसानों को अधिक फसल की बुआई न करने का स्पष्ट संदेश देना चाहिए और उन्हें यह समझना होगा कि अतिरिक्त फसल होने पर कीमतें ज्यादा नहीं हो सकती। गुजरात की तरह गन्ने की कीमत तीन किस्तों में दी जानी चाहिए क्योंकि यह एक सीजनल इंडस्ट्री है।’

गौरतलब है कि इस मार्केटिंग ईयर में चीनी का एक्सपोर्ट अब तक शुरू नहीं हो सका है। यह स्थिति तब है जब सरकार की तरफ गन्ना उद्योग को बढ़ावा देने और गन्ना किसानों के लिए 1,540 करोड़ के वित्तीय सहायता पैकेज का ऐलान हो चुका है। इसके तहत किसानों को मिलों में गन्ना सप्लाई करने पर प्रति क्विंटल 5.50 रुपये की अतिरिक्त रकम मिलेगी। 2017-18 में 17.5 करोड़ टन चीनी का निर्यात हुआ था जबकि इस साल अप्रैल से मई के बीच यह 2,40,093 टन रहा है। पिछले साल मार्च में सरकार ने 2017-18 मार्केटिंग ईयर के लिए 20 लाख टन चीनी का निर्यात करने की इजाजत दी थी। इसका मकसद चीनी का सरप्लस स्टॉक खत्म करना और गन्ना किसानों को 20,000 करोड़ का बकाया भुगतान करने के लिए गन्ना मिलों के कैश फ्लो को सुधारा जा सके।

SOURCEEconomic Times Commodities

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