सरकार के उपायों के बाद गन्ने का 20,159 करोड़ रुपये का बकाया तेजी से हो सकता है कम: इस्मा

 

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नयी दिल्ली, 11 मार्च, चीनी मिलों के प्रमुख संगठन भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के अनुसार हाल ही में सरकार द्वारा चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में वृद्धि करने तथा मिलों को 10,000 करोड़ रुपये का आसान ब्याज दर वाला ऋण उपलब्ध कराने जैसे उपायों के कारण किसानों का गन्ना बकाया तेजी से कम हो सकता है। यह गन्ना बकाया अब तक 20,159 करोड़ रुपये के सतर तक पहुंच गया है।

हालांकि, इस्मा ने कहा कि चालू महीने के लिए चीनी बिक्री का कोटा 24.5 लाख टन के उच्च स्तर पर निर्धारित करने से चीनी की दर में एक रुपये प्रति किलोग्राम की कमी आई है और इससे चीनी मिलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और सरकार द्वारा उठाये गये कुछ बेहतर कदमों पर कुछ नकारात्मक असर पड़ेगा।”
इस साल 22 फरवरी तक गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर 20,159 करोड़ रुपये बकाया है।

इस्मा ने एक बयान में कहा, “फरवरी महीने में गन्ने का इतना बड़ा बकाया इससे पहले किसी भी वर्ष में नहीं हुआ था।’’ सरकार ने चीनी मिलों को 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का आसान ब्याज दर वाला ऋण देने तथा न्यूनतम एक्स-मिल कीमत को 31 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ाने का निर्णय लिया है। इस्मा का मानना है कि इन कदमों की वजह से बकाया राशि तेजी से कम हो सकता है।

चीनी का ज्यादा उत्पादन होने और दाम घटने के कारण मिलों के समक्ष नकदी का संकट है और वे किसानों को उनके बकाये का भुगतान नहीं कर पा रही हैं।

समस्या के समाधान के लिए सरकार ने चीनी मिलों एवं किसानों के हित में पिछले डेढ़ साल में कई उपाय किए हैं।
इस्मा के अनुसार, चीनी मिलों ने पहली बार ‘बी हेवी मोलेसेज’ से उत्पादित लगभग 51 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति करने की पेशकश की है।

फरवरी-अंत तक, लगभग 12 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति की गई है, जिससे अक्टूबर 2018 से शुरू हुए चालू विपणन वर्ष में चीनी उत्पादन में 1,00,000 टन की कमी आई है।
अद्यतन उत्पादन आंकड़ों की जानकारी देते हुए, इस्मा ने कहा कि चीनी मिलों ने विपणन वर्ष 2018-19 की अक्टूबर-फरवरी अवधि के दौरान दो करोड़ 47.6 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है।

इस्मा ने इस विपणन वर्ष (अक्टूबर-सितंबर) के लिए देश का कुल चीनी उत्पादन 3.07 करोड़ टन आंका है, जो वर्ष 2017-18 के 3.25 करोड़ टन के उत्पादन से कम है, लेकिन फिर भी यह घरेलू आवश्यकता से अधिक है।

देश भर में फरवरी के अंत तक 466 मिलें परिचालन में थीं। महाराष्ट्र और कर्नाटक में मिलें काम करना बंद करने लगी हैं।
ब्राजील के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। इसकी वार्षिक खपत लगभग 2.6 करोड़ टन है।

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