चीनी मिलों को अपने आर्थिक उपार्जन बढ़ाने के लिए आय आधारित विकल्पों पर विचार करने की है जरूरत

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नई दिल्ली, 7 दिसम्बर: केन्द्र सरकार गन्ना किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिलाने के लिए नीतिगत फैसलें ले रही है। किसानों को आर्थिक सम्पन्नता दिलाने और उनकी आजीविका का स्तर बढ़ाने के लिए उच्च स्तर पर विचार किया जा रहा है। किसानों के वित्तीय हालात सुधारने के लिए तत्कालीन सरकार ने रंगराजन समिति गठित कर उसकी अनुशंसाओं को लागू करने की दिशा में पहल की थी। रंगराजन समिति की सिफारिशों के बारे में मीडिया से बात करते हुए भारत सरकार के कृषि लागत और मूल्य आयोग के अध्यक्ष विजय पॉल ने कहा कि चीनी उद्योग को आर्थिक तौर पर सशक्त बनाने की जरूरत है। इसके लिए रंगराजन समिति द्वारा बताये गए राजस्व भागीदारी नियम को अपनाया जाना चाहिए। उन्होने कहा कि आज चीनी मिलें आर्थिक संकट से गुजर रही है। मिलों की वित्तीय समस्या के समाधान के लिए उन्हे आत्म निर्भर बनना होगा। चीनी उद्योग से जुडे अन्य़ लाभकारी व्यवसायों पर ध्य़ान देना होगा। बदलते वक्त के अनुसार देश की चीनी मिलों की आर्थिकी बढ़ाने के लिए उन्हे आय आधारित अन्य विकल्पों को अपनाने की जरूरत है। शर्मा ने कहा कि चीनी मिलों को सरकार के भरोसे न रह कर खुद ही दीर्घकालिक औऱ लाभ आधारित दृष्टि से सोचना होगा। सरकार गन्ना किसानो के कल्याण और विकास के लिए अपने स्तर पर काम कर रही है इसके लिए एफआरपी तय किया हुआ है। लेकिन चीनी उद्योग को भी कुछ अलग हट के काम करने की जरूरत है। शर्मा ने कहा कि किसानों की आर्थिक मदद करना ठीक बात है लेकिन उचित मूल्य के बजाय हमें राजस्व भागीदारी के नियम को अपनाना चाहिए जिससे लम्बे समय किसान और चीनी उद्योग को फायदा हो।

गौरतलब है गन्ना किसानों और चीनी उद्योग के विकास के लिए तत्कालीन सरकार में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी रंगरानज की अध्यक्षता समिति गठित की थी जिसने साल 2012 मे अपनी रिपोर्ट में राज्यों से राजस्व भागीदारी नियम को अपनाने की सलाह दी थी। हालांकि इसे अपनाने की बाध्यता को शिथिल कर इसे लागू करने का अधिकार राज्यों को देने का किसानों ने विरोध भी किया था।

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