छत्तीसगढ़ की चीनी मिलों के भी आएंगे अच्छे दिन: मुख्यमंत्री भूपेश बघेल

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नई दिल्ली, 7 अक्टूबर: “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” की कहावत यू ही चरितार्थ नहीं है यहाँ का किसान और मज़दूर दोनों अपने प्रदेश के विकास में अपना समानान्तर योगदान दे रहे है। छत्तीसगढ़ को वैसे तो धान के कटोरे के रूप में जाना जाता है, लेकिन गन्ने की खेती भी कई इलाक़ों में आदिकाल से होती आयी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सूबे की चीनी मिलों के गन्ना बकाया को लेकर होने वाली समस्या से लगातार चिन्तित रहे है। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होने गन्ने से एथनॉल बनाने के लिए प्रदेश की सहकारी चीनी मिलों को वित्तीय धन आवंटित करने के अलावा अलग से प्रौत्साहन राशि देने का काम किया है। इस पहल के पीछे सरकार का मक़सद चीनी मिलों को वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ कर गन्ना किसानों को उनका बकाया दिलाना है। सरकार की इस पहल से सूबे की कई चीनी मिलों का जीर्णोद्धार हुआ है, चीनी मिलों का कार्यक्षमता बढी है, युवकों को रोजगार मिला है एवं गन्ना किसानों का बकाया समय पर चुकाने के साथ मिलों में गन्ना पैराई के वक्त होने वाली समस्या से भी राहत मिली है।

मुख्यमंत्री ने दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार गन्ना के साथ साथ धान के भूसे से बने एथनॉल को भी अगर अच्छे दामों पर ख़रीदती है तो किसानों को फ़ायदा होने के साथ चीनी मिलों को अतिरिक्त आमदनी के श्रोत बढ़ेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने केन्द्र से माँग की है कि हमारा प्रदेश धान उत्पादक प्रदेश है अगर यहाँ चीनी मिलें धान के पुआल से एथनॉल बनाएगी तो मिलों और किसानों दोनों के हित में होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि गन्ने से तैयार एथनॉल की तुलना में धान की भूसी से तैयार एथनॉल के दाम कम मिलते है इसलिए चीनी मिलें इसमें रूचि कम ले रही है लेकिन अगर केन्द्र सरकार इसके दाम बढ़ाये तो छत्तीसगढ़ की चीनी मिलों के भी अच्छे दिन आ जाएँगे।

बघेल ने कहा कि एथनॉल तैयार करने वाली चीनी मिलों को सहुलियत देने और चावल के भूसे से एथनॉल तैयार करने के संदर्भ में मैंने केन्द्रीय खाद्य एवं जनवितरण मंत्री रामविलास पासवान से भी चर्चा की है, उन्होने मुझे आशानुकूल आश्वासन दिया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पासवान जी ने मंत्रालय के सचिव से भी इस संदर्भ मे संभावित समाधान तलाशने पर मंथन करने को कहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने माँग रखी है कि धान से तैयार एथनॉल की रेट काफ़ी कम है। जब सरकार गन्ने से तैयार एथनॉल की दर 59 रुपये प्रति लीटर कर सकती है तो धान से तैयार एथनॉल की क़ीमत 47 रुपये क्यों है?

बघेल ने कहा कि अभी एथनॉल उत्पादन के लिये किसानों के पास अपनी फ़सल मे बदलाव लाना वित्तीय दृष्टिगत लाभकारी नहीं है। इसलिये केन्द्र सरकार को धान से बने एथनॉल के रेट बढ़ाकर चीनी मिलों को प्रेरित करना चाहिए। इससे चावल का उपयोग एथनॉल बनाने में होगा तो राज्य की तरफ़ से धान खरीद के लिए केन्द्र पर दबाव भी कम हो जाएगा।

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