दशकों से न्याय के इंतजार में भटक रहे है बिहार की चीनी मिल के कर्मचारी

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चकिया, बिहार, 16 जुलाई: केन्द्र सरकार देश की चीनी मिलों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर बदलते वक्त के साथ उनकी उत्पादन दक्षता में इज़ाफ़ा करने की अग्रसर है। सरकार की इस योजना से उत्साहित कई राज्यों की बंद पड़ी चीनी मिले फिर से शुरु हो गयी है। लेकिन दिया तले अंधेरा की कहावत को चरितार्थ करती है बिहार की चकिया चीनी मिल। ये चीनी मिल केन्द्र सरकार में कृषि मंत्री रहे राधामोहन सिंह के गांव से महज 15 किलोमीटर दूर है। लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि राधामोहन सिंह खुद केन्द्र सरकार में पाँच साल कृषि मंत्री रहे लेकिन ये मिल शुरु नहीं हो पायी।

चकिया की ये चीनी मिल बीते 25 सालों से बंद पड़ी है। और तक़रीबन 1200 से भी अधिक कर्मचारियों और किसानों का करोड़ों रुपयों का वेतन अटका पड़ा है। स्थानीय नागरिक मनसुख का कहना है कि 2014 में जब नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट में राधामोहन सिंह को कृषि मंत्री बनाया गया, तो हम लोगों को उम्मीद जगी कि अब उनके साथ न्याय होगा। लेकिन अफ़सोस यह है कि आजतक उन्होने चकिया मिल को चालू करवाने के लिए कुछ नहीं किया। मनसुख ने कहा कि राधामोहन सिंह ने चुनावों में मिल चालू करने में सहयोग का आश्वासन दिया था लेकिन चुनाव जीतने के बाद अपने ही वादे को वो भूल गए।

चीनी मिल से जुड़े कामगार लच्छू का कहना है कि चकिया क़स्बे के हर हिस्से में इस चीनी मिल से जुड़े लोग है जिनकी आजीविका इस मिल से चलती थी लेकिन जब से ये मिल बंद हुयी है तब से आजतक हमें इस मिल के शुरु होने का इन्तज़ार है। चकिया के किसान रामदास ने कहा कि पहले ये चीनी मिल बहुत अच्छी चलती थी हम यहाँ पर गन्ना लाते थे पैराई के तुरंत बाद पेमेंट हो जाता था लेकिन लेकिन धीरे धीरे मिल आर्थिक तंगी से जूझने लगी, हमारा पैसा भी बकाया रहने लगा। फिर मिल बंद हो गयी । हमें आजतक हमारे बकाया का इंतज़ार है।

चीनी मिल के कर्मचारी रहे धुनीराम ने कहा कि 1994 में ये चीनी मिल बंद हुई थी हमें हमारा वेतन नहीं मिला, नेताओं के यहाँ गए तो आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। धुनीराम ने कहा कि हम बेरोज़गार हो गए। हमारे जैसे कई कामगार है जिनका लाखों रुपया चीनी मिल में फंसा हुआ है। कोर्ट में भी केस किया लेकिन तारीख़ पे तारीख़ मिलती रहती है। वकील को देने के लिए भी पैसा नहीं है, करें तो क्या करें।

चकिया चीनी मिल के कर्मचारी 90 साल के बुजुर्ग शिव प्रसाद ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि वे चीनी मिल में ब्रॉयलर प्रमुख के पद पर थे, अच्छा ख़ासा घर चल रहा था, चीनी मिल बंद हुई तो घर में आर्थिक तंगी शुरु हो गयी। हम आज एक एक पैसे के लिए मोहताज है। 2 लाख रुपया मेरी तनख़्वाह का अटका है, उम्मीद में जी रहे है कि मिल फिर से चलेगी तो अटका हुआ पैसा मिलेगा लेकिन अब तो उम्मीदें भी ख़त्म सी लगती है। सरकार के यहाँ गुहार लगाई तो बड़ी मुश्किल से पेंशन शुरु हुई तो वो भी मात्र 1000 रुपए मासिक। शासन से कोई उम्मीद नहीं बची। एक एक दिन इन्तज़ार में कट रहा है।

चकिया चीनी मिल कर्मचारी संघ के महासचिव लक्ष्मी भाई ने बताया कि 1985 के बाद से ही चीनी मिल घाटे में चलने लगी जिससे मिल पर अतिरिक्त क़र्ज़ बढ़ा, बाद में बैंक से कर्ज लिया तो उसे चुका नहीं पाए तो 1994 में मिल बंद हो गई तब से आजतक गेट पर ताले लगे है। भूमाफ़ियाओं की नज़र इसकी ज़मीन पर है।

ग़ौरतलब है कि बिहार के गन्ना विभाग से संबद्द तक़रीबन 28 चीनी मिलो में से 17 चीनी मिलें आज शासन की बेरुख़ी के चलते बंद हो चुकी है। जो 11 चीनी मिलें फ़िलहाल चल रही है उनकी स्थिति भी कुछ ख़ास अच्छी नहीं है।

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