तमिलनाडु में चीनी मिलों और गन्ना किसानों के लिए कड़वी हुई चीनी

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चेन्नई : चीनीमंडी

रूठा हुआ मानसून, ठप चीनी मांग और कीमतों में गिरावट के कारण तमिलनाडु में चीनी उद्योग डगमगा गया है। 30,000 मिल मजदूरों, 1.5 लाख अप्रत्यक्ष कर्मचारियों और पांच लाख गन्ना किसानों की हालत पस्त है। नौ चीनी मिलें (आठ निजी स्वामित्व वाली और एक सहकारी) गन्ने की कमी के कारण इस सीजन में पेराई नही करेंगे और शेष मिले अपने संयंत्र को अपनी क्षमता के एक तिहाई पर संचालित करेंगे। राज्य की 25 चीनी मिलों में से कम से कम 13 मिलें बैंकों की एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ) में हैं, और यह ऋण की वसूली प्रक्रिया के हिस्से के रूप में बंद होने की संभावना बनी हुई हैं। तमिलनाडु को 2012 में चौथे सबसे बड़े चीनी उत्पादक से अब आठवें स्थान पर धकेल दिया है।

लगातार चौथे साल खराब मानसून….

उत्तर तमिलनाडु में, जहां अधिकांश चीनी मिलें स्थित हैं, लगातार चौथे साल खराब मानसून के कारण पानी की कमी हुई है, जिसमें 2017 सबसे खराब रहा जब उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम दोनों मानसून राज्य में विफल रहे। राज्य सरकार ने 9.5% की रिकवरी के साथ गन्ने का उचित और पारिश्रमिक मूल्य (एफआरपी) प्रति टन 2,750 रुपये के हिसाब से तय किया है। राज्य में औसत रिकवरी दर 8.9% है, जिसका मतलब है कि किसान को प्रति टन गन्ने के लिए 2,612.50 रुपये मिलते हैं। सरकार ने 1 किलो चीनी के लिए न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये तय किया है। मिलर्स का कहना है की, प्रति किलोग्राम चीनी की उत्पादन लागत लगभग 39 रूपये है, जबकी हम इसे 31 रुपये पर घाटे में बेचते हैं।

चीनी उद्योग की राज्य सरकार से मदद की गुहार….

चीनी उद्योग चाहता है कि, राज्य सरकार इसमें कदम उठाए। मिलर्स कहते है की एफआरपी मूल्य के आधार पर (किसानों को) जो भी गन्ना है, उसका भुगतान सरकार द्वारा सीधे किसान को किया जाना चाहिए। भुगतान की गई राशि को एक सॉफ्ट लोन में परिवर्तित किया जा सकता है और इससे वापस से मिल से वसूला जा सकता है।

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