चीनी मिलें नहीं होने के कारण कालाहांडी के गन्ना किसानों को भविष्य की चिंता

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कालाहांडी : गन्ने की खेती को पहले एक लाभदायक खेती माना जाता था, लेकिन अब यह कालाहांडी जिले के किसानों के लिए एक परेशानी बन गया है। हाटी और टेल नदियों के किनारों पर बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती की जाती थी। हालांकि, पिछले एक दशक में क्षेत्र में गन्ने को उचित बाजार की अनुपलब्धता के कारण जिले में गन्ने की खेती में तेजी से कमी आई है। उर्वरकों, कीटनाशकों और मजदूरी में वृद्धि के कारण, किसान गन्ने की खेती में नुकसान उठा रहे हैं, जिससे उन्हें खेती छोड़नी पड़ रही है और बेहतर आजीविका की तलाश में अन्य क्षेत्रों में पलायन कर रहे हैं।

जिले में चीनी मिलों की अनुपस्थिति में किसान गुड़ का उत्पादन करने और इसे स्थानीय बाजार में बेचने के पारंपरिक पद्धति का उपयोग करने के लिए बाध्य हैं। हालाँकि, आयातित उत्पादों के कारण गुड़ की माँग भी कम हो रही है, जिसके कारण कभी 15-20 एकड़ में गन्ने की खेती करने वाले किसान अब केवल गन्ने की खेती के लिए 1-2 एकड़ भूमि का उपयोग कर रहे हैं। उच्च श्रम दर के कारण, किसान घाटे का सामना कर रहे हैं और कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं इसलिए किसान अपनी पारंपरिक आजीविका को छोड़कर अन्य स्थानों पर पलायन करने को मजबूर हैं।

खबरों के अनुसार, राज्य के कृषि विभाग ने कालाहांडी जिले को 1000 हेक्टेयर गन्ने की खेती का लक्ष्य दिया था, लेकिन गन्ना बाजारों की कमी के कारण पिछले सीजन में केवल 40-50 हेक्टेयर गन्ने की खेती की जा सकी। खबरों के मुताबिक, जिले के कलामपुर, जयपताना, धर्मगढ़, गोलमुंडा और जूनागढ़ ब्लॉक में गन्ने की खेती में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई है। दूसरी ओर जिला कृषि अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि जिले में गन्ने की खेती में कमी आई है। जिला कृषि अधिकारी कामेश्वर मल्लिक ने कहा कि, क्षेत्र में चीनी मिलें नहीं हैं, इसलिए किसान संकटग्रस्त बिक्री के लिए जाने को मजबूर हैं। हम इसका कोई हल निकालना चाहते हैं ताकि इस फसल को उगाने वाले कृषक समुदाय को फिर से जीवित किया जा सके।

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