एफआरपी के बजाय चीनी लेने से ऐसे बढ़ सकती है गन्ना किसानों की मुश्किलें

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चीनी मिलें किसानों को पैसे के  बजाय चीनी देकर अपना पल्ला झाड़ लेंगे; लेकिन  पैसों की जगह चीनी लेकर किसान बुरी तरह फसेंगे  । बाजार की चीनी, इसकी बिक्री प्रणाली और व्यवसाय की मनमानी के कारण  किसानों की हालत और भी खस्ता होने की सम्भावना है । 

 पुणे : चीनी मंडी

शेष एफआरपी के बदले किसानों को चीनी देने की सांसद राजू शेट्टी द्वारा की गई मांग अच्छा विकल्प साबित होने में नाकाम हो सकती है । देश में किसानों के पास कोई भी  विपणन तकनीक नही है, इस तथ्य के कारण  किसानों की अब भी चौतरफा लूट हो रही हैं। यह किसानों की पहुंच से परे है कि, वे चीनी बेचने में सक्षम हैं । चीनी मिलें किसानों को पैसे के  बजाय चीनी देकर अपना पल्ला झाड़ लेंगे; लेकिन  पैसों की जगह चीनी लेकर किसान बुरी तरह फसेंगे  । बाजार की चीनी, इसकी बिक्री प्रणाली और व्यवसाय की मनमानी के कारण  किसानों की हालत और भी खस्ता होने की सम्भावना है।

राज्य में ‘एफआरपी’ के मुद्दे पर  स्वाभिमानी शेतकरी संघठन और चीनी मिलें आमने-सामने आ गई हैं। मिलों का कहना है की, सरकार की मदद के बिना  एफआरपी नहीं दिया जा सकता है, और चीनी मिलो ने दो चरणों में  एफआरपी भुगतान शुरू किया था, इसके कारण स्वाभिमानी और चीनी मिलें आपस में भीड़ गई । गुस्साए स्वाभिमानी शेतकरी संघठन के कार्यकर्ताओ ने कोल्हापुर, सांगली जिले के कई चीनी मिलों के ऑफिसों को आग लगा दी, तोड़फोड़ भी की।

इसी बीच सांसद राजू शेट्टी ने चीनी आयुक्त से मुलाकात की और उनके सामने  मिलें अगर  एफआरपी की शेष राशि नकद नही दे सकते है तो फिर वह चीनी ही दे ऐसी मांग रखी । शेट्टी की इस मांग को लेकर किसानों में चर्चा शुरू हुई है। शेट्टी की मांग  सिद्धांतिक नजर से  सही है, हालाँकि वह व्यावहारिक नहीं है। हालांकि बैंकों के पास चीनी गिरवी हैं, वे किसानों को देने का फैसला करने पर भी बैंक गिरवी चीनी नहीं छोड़ेंगे।

किसानों को चीनी देने के बाद भी इसे निपटाना मुश्किल है। केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किसान खुले बाजार में चीनी नहीं बेच सकते है । यहां तक कि अगर वे बेचने के लिए दृढ़ हैं, तो वे चीनी मिलने के तुरंत बाद अपनी चीनी को बेचने की कोशिश करेंगे क्योंकि उनके पास भंडारण क्षमता और सुरक्षा नहीं है। चीनी व्यापारी कीमतें घटाने का भी डर है। चूंकि किसानों के पास विपणन व्यवस्था नहीं थी, इसलिए उन्हें सब्जी बेचते हुए लूट लिया जाता है । फिर चीनी का क्या होगा? इसलिए, एफआरपी की शेष राशि के बजाय, किसानों को चीनी देकर मिलें खुद को मुक्त करेगी; लेकिन किसान बुरी तरह फ़सने की पूरी सम्भावना हैं।

ऑस्ट्रेलिया में, किसानों को पैसे के बदले मिलती  हैं चीनी…

गन्ना किसानों को पैसे के बजाय चीनी दी जाती है,  ऑस्ट्रेलिया में कुल उपज के  65% चीनी किसानों को  और 35 प्रतिशत चीनी मिलें ले जाती है  । किसान मिलों की सहायता से वायदा बाजारों में चीनी की  निर्यात या बिक्री करते हैं; लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि,  यह भारत में संभव नहीं है क्योंकि  भारतीय किसानों  के पास कोई भी  विपणन तकनीक नहीं है।

…पर्याप्त चीनी का किसान करेंगे क्या ?

देशभर में लगभग 85% गन्ना उत्पादक डेढ़ एकड़ में उपज लेतें हैं। औसतन,  60 टन गन्ना उत्पादन हुआ, तो  एफआरपी का 80 प्रतिशत भुगतान करने के बाद, शेष 20 प्रतिशत (औसत 500 रुपये प्रति टन) में 10 क्विंटल चीनी मिल सकती  है। देश में घरेलू चीनी का उपयोग प्रति माह एक आदमी डेढ़ किलो करता है। पांच लोगों के परिवार को प्रति माह 7.5 किलो और प्रति वर्ष 90 किलो चीनी मिलती है। इसलिए, उसे पर्याप्त 9 क्विंटल चीनी को  बेचना होगा।

 

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SOURCEChiniMandi

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