चीनी मिल बंद होने से श्रमिक और गन्ना किसानों का भविष्य अंधार में लटका

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पांडिचेरी : पांडिचेरी सहकारी चीनी मिल के बंद होने से कई श्रमिकों का भविष्य अंधार में लटक गया है। इस सहकारी उपक्रम के लिए 1994 में कठिनाइयाँ शुरू हुईं, 2011-12 में बढ़ गईं और इकाई को 2017 में बंद कर दिया गया। मिल लगभग 150 करोड़ के घाटे में चलने के कारण, प्रबंधन ने मार्च 2017 में परिचालन बंद कर दिया। खबरों के मुताबिक, मिल क्व सेंकडो श्रमिक पिछले 37 महीनों से बिना वेतन के हैं। कई कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए है, लेकिन उन्हें अभी तक सेवानिवृत्ति का लाभ नहीं मिला है। मिल के कम से कम 100 कर्मचारी पूरी तरह से उस वेतन पर निर्भर थे जो वे मिल से कमाते थे।

पांडिचेरी किसान मंच के सचिव वी. शंकर ने कहा कि, मिल परिचालन बंद करने के सरकार के फैसले के कारण नुकसान हुआ है। मिल के बंद होने के बाद से, तमिलनाडु के नेल्लिकम और मुंडीमपक्कम में नेट्टपक्कम, एमबलम, थिरुभुवनई, मंगलम, मन्नादीपेट, विलियानुर और ओससुडू में किसानों को गन्ने को निजी मिलों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। इन मिलों ने पुडुचेरी में किसानों को कम कीमत का भुगतान किया है। श्रमिकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए, सरकार को मिल का परिचालन शुरू करने के लिए तत्काल निर्णय लेना चाहिए। पांडिचेरी किसान संघ के अध्यक्ष एस. राममूर्ति ने कहा, दस साल पहले, मिल हर साल 3.25 टन गन्ने की पेराई करती थी। जब 2017 में इसे बंद किया गया था, तब गन्ने की पेराई लगभग 60,000 टन थी। कुप्रबंधन, सरकार की ओर से अनुदान की कमी के कारण मिल की स्थिति खराब हो गई।

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