चीनी उद्योग के व्यापार को बढ़ाने की है जरूरत: डॉ एच एस गुप्ता

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नई दिल्ली: भारत कृषि प्रधान देश है। यहां की 70 फीसदी से अधिक की आबादी आज भी कृषि और इससे जुडे कार्यों पर निर्भर करती है। आज़ादी से पहले तक देश में कृषि का जीडीपी में योगदान बहुत ज्यादा था लेकिन स्वतंत्रता के बाद विकास की रफ़्तार में कृषि का क्षेत्र पीछे छूटता गया। आज कृषि की हिस्सेदारी जीडीपी में पहले के मुकाबले कम है।

अगर हमें देश को विश्व की ऊभरती हुई वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाना है तो कृषि क्षेत्र के विकास पर ज्यादा ध्यान देना होगा। और ये तब ही संभव है जब हम गन्ना किसान और चीनी उद्योग को प्रौत्साहन देंगे। राजधानी दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए बॉरलोग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया के पूर्व महानिदेशक डॉ एच एस गुप्ता ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की बडी अर्थव्यवस्था में से एक है। भारत को अगर 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है तो कृषि से संबद्ध गन्ना किसानों और चीनी उद्योग का कायाकल्प ज़रूरी है। देश के पांच करोड़ से अधिक किसान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आज भी गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं। सालाना 65 हज़ार करोड़ रुपये का गन्ने का मूल्य है साथ ही तकरीबन 2 मिलियन लोगों के लिए ये सैक्टर रोजगार का बड़ा माध्यम है। घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही चीनी उद्योग हमारे लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने का भी बडा माध्यम है। इसके अलावा चीनी उद्योग से हर साल करोडों रूपयों की बिजली और इथेनॉल की आवश्यकता की पूर्ति होती है। डॉ गुप्ता ने कहा कि चीनी उद्योग आज भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूती दे रहा है। ये उद्योग देश को प्रयक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर 75,000 करोड़ से अधिक की राजकोषीय पूर्ति करता है। उन्होंने कहा कि देश में आज चीनी उद्योग के व्यापार और कारोबार को बढ़ाने की जरूरत है, इसके लिए सरकार को गन्ना उद्योग के अनुकूलन नीति बनानी चाहिए, देश में निवेश अनुकूल माहौल बनाना चाहिए, गन्ने की खेती के अनुकूल वातावरण तैयार करना चाहिए ताकि गन्ना किसानों को सशक्त कर चीनी उद्योग को आर्थिक तौर पर मजबूत बनाया जा सके।

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