यह चीनी मिल बन गया है चुनावी मुद्दा…

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मथुरा : चीनी मंडी

मथुरा जिले की स्थिती एक समय पर ऐसी थी की यहाँ के किसानों की मुख्य फसल गन्ना थी, 70 के दशक तक किसानों को गन्ने की खेती से बेहतरीन मुनाफा मिला। किसानों की इस खुशहाली में छाता चीनी मिल का योगदान कोई नही भूल सकता, लेकिन गलत प्रबंधन के चलते वर्ष 2008 में मिल को ‘ताला’ लग गया। तब से मथुरा जिले के किसानों की हालत बद से बदतर हो गई और यहाँ की राजनीति में केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है। इस बार चुनाव में भी यह चुनावी मुद्दा बना हुआ है।

छाता शुगर मिल की स्थापना बाबू तेजपाल सिंह ने कराई। शुगर मिल द्वारा पेराई 1976 से शुरू हो गई। किसानों में भी अपना रुख गन्ने की फसल के प्रति बढ़ाया। इससे 1977 में शुरू हुए पहले पेराई सत्र के लिए 11937 हेक्टयर में गन्ना की पैदावार हुई। चीनी मिल में पांच लाख 62 हजार 796 कुंतल गन्ना पहुंचा।गन्ने की जादा फसल उपलब्धी के कारण जल्दही घाटमपुर चीनी मिल की नीव रखी गई। गन्ने से अच्छे मिलने से 1996-97 में किसानों ने रिकॉर्ड 27001 हेक्टेयर में गन्ना उगाया, लेकिन बाद में मिल चलाने वाले प्रबंधन की गलतियों से संचालन की गति धीमी पड़ गई। मुनाफेवाली मिल देखते ही देखते घाटे में चली गई, किसानों का बकाया भुगतान भी बढ़ने लगा और मिल बंद हो गई।

2008-09 में चीनी मिल को ताला लगा दिया गया, लेकिन पैराई बंद होने के दौरान भी मथुरा जिले में 4825.449 हेक्टेयर में गन्ने की फसल थी। मिल बंद होने से अबतक हर चुनाव में सत्ताधारी और विपक्षी दलों द्वारा छाता चीनी मिल शुरू करने के वादे किए जाते हैं। 2014 में चुनाव के दौरान तो सेंटर खुलवाकर गन्ना खरीदा था, लेकिन वह पहल भी चुनावी जुमला निकली। हर बार छाता चीनी मिल के मुद्दे को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

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