बायो इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए NSI और ICAR-IIMR द्वारा MOU पर हस्ताक्षर

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कानपुर: पेट्रोल में १० प्रतिशत ब्लेंडिंग की आवश्यकता की पूर्ति हेतु जैव-इथेनॉल (बायो इथेनॉल) के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपूर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् इंडियन मिलेट रिसर्च इंस्टिट्यूट, हैदराबाद (ICAR-IIMR, Hyderabad) द्वारा मिलकर समेकित प्रयास करने हेतु सहमति बनी है | इस सम-सामयिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु “स्वीट सोरगम” की विभिन्न प्रजीतियों को विकसित करना एवं उपयुक्त तकनीक को इजाद करने पर सहमति बनी जिससे स्वीट सोरगम (मीठी चरी) की विभिन्न प्रजीतियों से इथेनॉल का उत्पादन किया जा सके। इस संदर्भ में दोनों संस्थानों के प्रमुखोद्वारा एक MoU पर आज दि. 11.2.2020 को राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपूर में हस्ताक्षर किये गए।

इस MoU का उद्देश्य (मीठी चरी) “स्वीट सोरगम” से इथेनॉल उत्पादन की संभावनाओ की तलाश के लिए मिलकर अनुसंधान कार्य करने हेतु प्रोजेक्ट को विकसित करना है | समझौते (Undertaking) के अनुसार ।CAR-IIMR, हैदराबाद द्वारा विकसित मीठी चरी के जीनोटाइप का परिक्षण राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपूर के फार्म में किया जायेगा | उत्तरी भारत में इस चारि की खेतों में रोपाई का सर्वाधित उपयुक्त समय फरवरी एवं जून-जुलाई है।

पत्रकारों से वार्ता करते हुए राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपूर के निदेशक, प्रो. नरेंद्र मोहन ने बताया की मीठी चरी की संस्थान के फार्म में रोपाई के उपरांत इसकी विभिन्न प्रजीतियों से इथेनॉल उत्पादन को संभावनाओ को तलाशने का कार्य राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपूर में किया जायेगा। प्रो. मोहन ने बताया की इसके अतिरिक्त हम पेय पदार्थों और कन्फेक्शनरी उद्योग में भी मीठी चरी के रस व सिरप के उपयोग की संभावनाओ का पता लगाएंगे।

मीठी चरी से इथेनॉल उत्पादन को उत्तर भारत में एक प्रमुख संभावित फसल के रूप में मन जा सकता है, क्योंकि यह गर्म मौसम की फसल है जो की उच्च तापमान में और अपेक्षाकृत काम दिनों में तैयार हो जाती है।

ICAR-भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के डॉ. विलास टोनापी ने बताया की यह कई अन्य फसलों की तुलना में सूखे (कम पानी) और उच्च तापमान को सहन क्र सकती है, लेकिन कम तापमान में यह फसल (मीठी चरी) अच्छी तरह से विकसित नहीं हो पति है।

डॉ. विलास टोनापी ने आगे बताया की यह लगभग चार महीने की अल्प अवधि वाली फसल है जिसको कि गन्ने की तुलना में बहुत कम पानी की आवश्यकता पड़ती है। पूर्ण रूप से तैयार फसल की उत्पादकता लगभग 40 टन/हेक्टेयर होती है जिसके 60 प्रतिशत प्राप्त जूस एक्सट्रैक्शन से तीन टन गुड़ एवं 3.5 टन सीरप प्राप्त किया जा सकता है। इसके डंठल (Stalk) के फर्मेंटेशन से लगभग 2000 ली. इथेनॉल का उत्पादन संभव है। इस प्रकार प्रतिटन मीठी चरी से लगभग 50 ली. इथेनॉल का उत्पादन किया जा सकता है। इस उत्पादन प्रक्रिया के बाद बचे हुये डंठलों के अवशेष जो लगभग 12-15 टन प्रति हेक्टेयर होता है का उपयोग ईंधन या चारे के रूप में किय अजा सकता है। डॉ. टोनापी ने बताया की हालांकि उपरोक्त अध्ययन की वास्तविक तस्वीर तुलनात्मक अध्ययन के उपरांत ही सामने आयेगी।

राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपूर के डॉ. अशोक कुमार, सहा. आचार्य (कृषि रसायन) ने बताया की मीठी चरी को इथेनॉल उत्पादन के लिए राष्ट्रीय जैव – ईंधन नीति में आशाजनक फसल के रूप में पहचाना गया है एवं मान्यता दी गई है। डॉ. अशोक कुमार ने कहा कि हम अभी तक भारत सरकार द्वारा घोषित पेट्रोल में 10 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग के उत्पादन लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाए है। मीठी चरी से इथेनॉल उत्पादन केवैकल्पिक फीड स्टाफ का विकास देश के लिए आवश्यक इथेनॉल के उत्पादन की दिशा में एक लंबा रास्ता तय कर सकता है।

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